Saturday, June 9, 2012

नित्यकर्म


-: ब्रह्ममुहूर्त में जागरण:-

सूर्योदय से चार घड़ी (1:36घं.मि.) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र में निषिद्ध है।
करावलोकन.आँखों के खुलते ही दोनों हाथ की हथेलियों को देखते हुए निम्नलिखित श्लोक का पाठ करें।
करागे्र वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा  प्रभाते  करदर्शनम्।।
हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी, हाथ के मध्य में सरस्वती, और हाथ के मूलभाग में ब्रह्मा जी निवास करते हैं। अतः प्रातः काल दोनों हाथों का अवलोकन करना चाहिये।
भूमि वन्दना.शय्या से उठकर पृथ्वी पर पैर रखने के पूर्व पृथ्वी माता का अभिवादन करें और उन पर पैर रखने की विवशता के लिये उनसे क्षमा मांगते हुये निम्न श्लोक का पाठ करें।
समुद्र वसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते। विष्णु पत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।।
समुद्र रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली पर्वत स्वरूप स्तनों से मण्डित भगवान् विष्णु की पत्नी पृथ्वी देवी! आप मेरे पादस्पर्श को क्षमा करें।
मंगल दर्शन.तत्पश्चात् गोरोचन, चन्दन, सुवर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण मणि आदि मांगलिक वस्तुओं का दर्शन करें तथा गुरु, अग्नि और सूर्य को नमस्कार करें।
माता, पिता गुरु एवं ईश्वर का अभिवादन.पैर, हाथ, मुख धोकर कुल्ला करें। इसके बाद रात का वस्त्र बदलकर आचमन करें। पुनः निम्नलिखित श्लोकों को पढ़कर सभी अंगों पर जल छिड़कंे। ऐसा करने से मानसिक स्नान हो जाता है।
-:मानसिक शुद्धि का मन्त्रः-
अतिनीलघनश्यामं नलिनायतलोचनम्। स्मरामि पुण्डरीकाक्ष तेनस्नातो भवाम्यहम्।।
इसके बाद मूर्तिमान् भगवान् माता.पिता एवं गुरुजनों का अभिवादन करें।
कर्म और उपासना का समुच्चय (तन्मूलक संकल्प).इसके बाद परमात्मा से प्रार्थना करें कि हे परमात्मन्! श्रुति और स्मृति आपकी ही आज्ञाएँ हैं। आपकी इन आज्ञाओं के पालन के लिये मैं इस समय से लेकर सोने तक सभी कार्य करूँगा। इससे आप मुझ पर प्रसन्न हों क्योंकि आज्ञापालन से बढ़कर स्वामी की और कोई सेवा नहीं होती।
 स्नान से पूर्व . गंगे च यमुने चैव, गोदावरि सरस्वती। 
      नर्मदे सिन्धु कावेरी, जलेस्मिन् संन्निधिं कुरु।।
अर्थ.हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु और कावेरी आप सभी इस जल में उपस्थित हों।
भोजन करने से पूर्व श्लोकः.अन्नपूर्णे  सदापूर्णे शंकरप्राण वल्लभे। 
ज्ञान वैराग्य सिद्धîर्थं भिक्षांदेहि च पार्वती।।
शयन से पूर्व श्लोक.ब्राह्माणं शंकरं विष्णुं यमं  रामं  दनुं बलिम्।
सप्तैतानि स्मरेनित्यं दुस्वप्नस्तस्य नश्यति।।
ब्रह्मा, शंकर, विष्णु, यम, राम, दनु और बलि इन सातों के नाम का नित्य स्मरण करने से दुः स्वप्न नष्ट होते है।
दैनिक कर्मों की सूची निर्धारण.इसी समय दिन रात के कार्यों की सूची तैयार कर लें। आज धर्म के कौन.कौन से कार्य करने हैं? धन के लिये क्या करना है? शरीर में कोई कष्ट तो नहीं है? यदि है तो उसका कारण क्या है? और उनका प्रतिकार क्या है।

Thursday, May 24, 2012

श्‍ा‌नि उपाय


शनिवार माहात्म्य एवं कथा विधि
शनि-ग्रह की शांति तथा सुखों की इच्छा रखने वाले स्त्री-पुरुषों को शनिवार का व्रत करना चाहिए । विधिपूर्वक शनिवार का व्रत करने से शनिजनित संपूर्ण दोष, रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं, धन का लाभ होता है । स्वास्थ्य, सुख तथा बुद्धि की वृद्धि होती है । विश्‍व के समस्त उद्योग, व्यवसाय, कल-कारखाने, धातु उद्योग, लौह वस्तु, समस्त तेल, काले रंग की वस्तु, काले जीव, जानवर, अकाल मृत्यु, पुलिस भय, कारागार, रोग भय, गुरदे का रोग, जुआ, सट्टा, लॉटरी, चोर भय तथा क्रूर कार्यों का स्वामी शनिदेव है । शनिजनित कष्ट निवारण के लिए शनिवार का व्रत करना परम लाभप्रद है । शनिवार के व्रत को प्रत्येक स्त्री-पुरुष कर सकता है । वैसे यह व्रत किसी भी शनिवार से आरंभ किया जा सकता है । श्रावण मास के श्रेष्ठ शनिवार से व्रत प्रारंभ किया जाए तो विशेष लाभप्रद रहता है । व्रती मनुष्य नदी आदि के जल में स्नान कर, ऋषि-पितृ अर्पण करे, सुंदर कलश जल से भरकर लावे, शमी अथवा पीपल के पेड़ के नीचे सुंदर वेदी बनावे, उसे गोबर से लीपे, लौह निर्मित शनि की प्रतिमा को पंचामृत में स्नान कराकर काले चावलों से बनाए हुए चौबीस दल के कमल पर स्थापित करे । काले रंग के गंध, पुष्प, अष्टांग, धूप, फूल, उत्तम प्रकार के नैवेद्य आदि से पूजन करे । शनि के इन दस नामों का उच्चारण करे-

ॐ कोणस्थाय नमः, ॐ रौद्रात्मकाय नमः, ॐ शनैश्चराय नमः, ॐ यमाय नमः, ॐ बभ्रवे नमः, ॐ कृष्णाय नमः, ॐ मंदाय नमः, ॐ पिप्पलाय नमः, ॐ पिंगलाय नमः, ॐ सौरये नमः ।
शमी अथवा पीपल के वृक्ष में सूत के सात धागे लपेटकर सात परिक्रमा करे तथा वृक्ष का पूजन करे । शनि पूजन सूर्योदय से पूर्व तारों की छांव में करना चाहिए । शनिवार व्रत-कथा को भक्ति और प्रेमपूर्वक सुने । कथा कहने वाले को दक्षिणा दे । तिल, जौ, उड़द, गुड़, लोहा, तेल, नीले वस्त्र का दान करे । आरती और प्रार्थना करके प्रसाद बांटे ।

Poojan Samagri


Poojan Samagri

  1. ROLI
  2. MAULI
  3. NARIYAL
  4. DHOOP
  5. AGARBATTI
  6. LAUNG
  7. ELAYACHI
  8. SUPADI
  9. KAPOOR
  10. MACHISH
  11. SINDOOR
  12. PANCHMEWA
  13. HALDI, SABUT-PAWDER
  14. PEELI SARSO
  15. JANEU
  16. GHEE
  17. SHAHAD
  18. BOORA
  19. ITTRA
  20. CHAWAL
  21. DEEPAK
  22. KEVADA JAL
  23. GULAB JAL
  24. KAPDA WIGHT
  25. WASTRA
  26. RET
  27. PHOOL, MALA
  28. DAHI
  29. DOODH
  30. PAN PATTA
  31. AAM PATTA
  32. PHAL
  33. MEETHA
  34. THALI PLEN
  35. KATORI
  36. CHAMMACH
  37. GILAS
  38. LOTA Purana
  39. LOTA NAYA
  40. AASAN
  41. BATTI, RUI
  42. HAWAN SAMAGRI
  43. TIL
  44. JAU
  45. CHAWAL
  46. GHEE
  47. BOORA
  48. GOOGLE
  49. KAMAL GATTA
  50. LOWAN
  51. NAVAGRAH SAMIDHA
  52. AAM KI SAMIDHA
  53. BEL GIRI
  54. GOLA
  55. BHOJ PATTRA
  56. KATORI NAYI
  57. BHAGONA NAYA
  58. HAWAN KUND

शिव पंचाक्षर स्त्रोत


शिव पंचाक्षर स्त्रोत

 नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय
 नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मै न काराय नम: शिवाय:॥

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय
 मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे म काराय नम: शिवाय:॥

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय
 श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै शि काराय नम: शिवाय:॥

वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय
 चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै व काराय नम: शिवाय:॥

यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकस्ताय सनातनाय
 दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै य काराय नम: शिवाय:॥

पंचाक्षरमिदं पुण्यं य: पठेत शिव सन्निधौ
 शिवलोक वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥


शिव पंचाक्षर स्त्रोत भक्तों की हर मनोकामना पूरी करता है।

शिव तांडव स्तोत्रम्




शिव तांडव स्तोत्रम्


जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले , गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम् ।

डमड्डमड्ड्मड्ड्मन्निनादवड्ड्मर्वयं , चकार चण्डताण्डवं तनोतु न: शिव:शिवम् ॥ 1 ॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूध्र्दनि ।

धगध्दगध्दगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके , किशोरचन्द्रशेखरे रति: प्रतिक्षणं मम ॥ 2 ॥

धराधरेन्द्ननन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।

कृपाकटाक्षधोरणीनिरुध्ददुर्धरापदि , क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ 3 ॥

जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-कदम्बकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।

मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे , मनोविनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ 4 ॥

सहस्त्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-प्रसूनधुलिधोरणीविधुसराङध्रिपीठभू: ।

भुजंगराजमा्लया निबध्दजाटजूटक: , श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखर: ॥ 5 ॥

ललाटचत्वरज्वलध्दनञ्ज्यस्फुलिंगभा-निपीतपंचसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।

सुधामयुखलेखया विराजमान शेखरं , महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु न: ॥ 6 ॥

करालभाल्पट्टिकाधगध्दगध्दगज्ज्वलध्दनञ्ज्याहुतीकृतप्रचण्डपंचसायके ।

धराधरेन्द्ननन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥ 7 ॥

नवीनमेघमण्डलीनिरुध्ददुर्धरस्फुरत्कुहुनिशीथिनीतम: प्रबन्धबध्दकन्धर: ।

निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुर: , कलानिधानबन्धुर: श्रियं जगदधुरन्धर: ॥ 8 ॥

प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभावलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबध्दकन्धरम् ।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं , गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ 9 ॥

अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमञ्जरी , रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं , गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ 10 ॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमभ्दुजंगमश्व्र्स , द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।

धिमिध्दिमिध्दिमिद्ध्वनन्मृदंगतुन्गमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्ड्ताण्डव: शिव: ॥ 11 ॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठ्यो: सुहृद्विपक्षपक्षयो: ।

तृणारविन्दचक्षुषो: प्रजामहीमहेन्द्रयो: , समप्रवृत्तिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥ 12 ॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे वसन् , विमुक्तदुर्मति: सदा शिर:स्थमञ्जलिं वहन् ।

विलोललोचनो ललामभाललग्नक: , शिवेति मन्त्रामुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥ 13 ॥

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं , पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुध्दिमेति सन्त्ततम् ।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं , विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम् ॥ 14 ॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं , य: शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां , लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भु: ॥ 15 ॥

Saturday, April 28, 2012


शिवपूजन के लिये विशेष तथ्य

कामना भेद से रुद्राभिषेक द्रव्य

१. जल से अभिषेक करने पर शीघ्र ही वृष्टि होती है, एवं ज्वर भी शान्त होता है।
२. कुशोदक से अभिषेक करने पर व्याधियों का शमन होता है।
३. दधि से अभिषेक करने पर पशु आदि की प्राप्ति होती है।
४. गन्ने के रस से अभिषेक करने पर लक्ष्मी की सिद्धि प्राप्त होती है।
५. मधु से अभिषेक करने पर धन की प्राप्ति होती है।
६. तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
७. दूध से अभिषेक करने पर शीघ्र ही पुत्र की प्राप्ति होती है,  और प्रमेह रोग भी नष्ट होता है।
८. घी की धारा से सहस्र नोमों से अभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।
९. शर्करा मिश्रित दूध से अभिषेक करने पर जड बुद्धि भी श्रेष्ठ बुद्धि में परिवर्तित हो जाती है।
१ॉ. सर्षों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रुओं का शमन होता है।
११. शिवजी का अभिषेक गो शृङ्ग से करना चाहिये (शिवं गवयशृङ्गेण)।
१२. शिवजी के अभिषेक के लिये यजुर्वेदोक्त रुद्री प्रशस्त मानी गयी है।
१३. पवित्र मनुष्य सदा ही उत्तराभिमुख होकर शिवार्चन करें।
१४. मृत्तिका, भस्म, गोबर, आटा, ताँबा और कांस का शिवलिङ्ग बानाकर जो मनुष्य एकबार भी पूजन करता है वह अयुतकल्प तक स्वर्ग में वास करता है।
१५. नौ, आठ, और सात अँगुल का शिवलिङ्ग उत्तम होता है। तीन, छः, पाँच तथा चार अँगुल का शिवलिङ्ग मध्यम होता है। तीन, दो, और एक अँगुल  का शिवलिङ्ग कनिष्ठ होता है। इस प्रकार यथा क्रम से चर प्रतिष्ठित शिवलिङ्ग नौ प्रकार का कहा गया है।
  १६. शूद्र, जिसका उपनयन सँस्कार नहीं हुआ है, स्त्री और पतित ये लोग केशव या शिव का स्पर्श करते हैं तो नरक प्राप्त करते हैं।                            (स्कन्द पुराण)
१७. स्वयं प्रदुर्भूत बाणलिंग में, रत्नलिंग में, रसनिर्मित लिंग में और प्रतिष्ठित लिंग  में चण्ड का अधिकार नहीं होता।
१८. जहाँ पर चण्डाधिकार होता है वहाँ पर मनुष्यों को उसका भोजन नहीं करना चाहिये। जहाँ चण्डाधिकार नहीं होता है वहाँ भक्ति से भोजन करें। 
(नि.सि.पृ.सं.७२ॉ)
१९. पृथिवी, सुवर्ण, गौ, रत्न, ताँबा, चाँदी, वस्त्रादि को छोड़कर चण्डेश के लिये निवेदन करें। अन्य अन्न आदि, जल, ताम्बूल, गन्ध और पुष्प, भगवान् शंकर को निवेदित किया हुआ सब चण्डेश को दे देना चाहिये।(नि.सि.पृ.सं.७१९)
२ॉ. विल्वपत्र तीन दिन और कमल पाँच दिन वासी नहीं होता और तुलसी वासी नहीं होती। (नि.सि.पृ.सं.७१८)
२१. अँगुष्ठ, मध्यमा और अनामिका से पुष्प चढ़ाना चाहिये एवं अँगुष्ठ-तर्जनी से निर्माल्य को हटाना चाहिये।


शिवलिङ्ग पूजन का प्रारम्भ एवं महत्त्व

शिवलिङ्ग के पूजन प्रारम्भ होने के सम्बन्ध में एक पौराणिकी कथा प्राप्त होती है कि-दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में शिवजी का भाग नहीं रखा, जिससे कुपित होकर सती पार्वती ने दक्ष के यज्ञमण्डप में योगाग्नि द्वारा अपना शरीर जलाकर प्राण त्याग कर दिया। सती के शरीर के त्यागे जाने का समाचार सुनकर शिवजी अत्यन्त कुपित हो गये और वे नग्नावस्था में पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे। एक दिन वह नग्नावस्था में ही ब्राह्मणों की बस्ती में पहुँच गये। शिवजी के नग्न स्वरूप को देखकर ब्राह्मणों की स्त्रियाँ भगवान् शिवजी पर मोहित हो गयीं। स्त्रियों की मोहावस्था को देखकर ब्राह्मणों ने शिवजी को शाप दिया कि ‘इनका लिङ्ग इनके शरीर से तत्काल गिर जाय।’ ब्राह्मणों के शाप के प्रभाव से लिङ्ग उनके शरीर से अलग होकर गिर गया, जिससे तीनों लोकों में घोर उत्पात होने लग गया। 
समस्त देव, ऋषि, मुनि व्याकुल होकर ब्रह्माजी की शरण में गये। ब्रह्माजी ने योगबल से शिव-लिङ्ग के अलग होने का कारण जान लिया और वह समस्त देवताओं, ऋषियों और मुनियों को अपने साथ लेकर शिवजी के समीप पहुँचे। ब्रह्माजी ने शिवजी से प्रार्थना की कि-‘आप अपने लिङ्ग को पुनः धारण कीजिये, अन्यथा तीनों लोक नष्ट हो जायेंगे। ब्रह्माजी की प्रार्थना सुनकर शिवजी बोले कि-आज से सभी लोग मेरे लिङ्ग की पूजा प्रारम्भ करदें, तो मैं पुनः अपने लिङ्ग को धारण कर लूँगा। शिवजी की बात सुनकर ब्रह्माजी ने सर्व प्रथम सुवर्ण का शिवलिङ्ग बनाकर उसका विधिवत् पूजन किया। पश्चात् देवताओं, ऋषियों और मुनियों ने अनेक द्रव्यों के शिव-लिङ्ग बनाकर पूजन किया। तभी से शिव-लिङ्ग के पूजन का क्रम प्रारम्भ हुआ।
जो मनुष्य किसी तीर्थ में तीर्थ की मिट्टी से शिवलिङ्ग बनाकर उनका हजार बार अथवा लाख बार अथवा करोड़ बार सविधि पूजन करता है, तो वह साधक शिवस्वरूप हो जाता है।जो मनुष्य तीर्थ में मिट्टी, भस्म, गोबर अथवा बालू का शिवलिङ्ग बनाकर एक बार भी उसका सविधि पूजन करता है, वह साधक दस हजार कल्प तक स्वर्ग में निवास करता है।
शिव-लिङ्ग का विधिपूर्वक पूजन करने से मनुष्य सन्तान, धन, धान्य, विद्या, ज्ञान, सद्बुद्धि, दीर्घायु और मोक्ष को प्राप्त करता है।
जिस स्थान पर शिवलिङ्ग का पूजन होता है, वह तीर्थ न होने पर भी तीर्थ बन जाता है।
जिस स्थान पर सर्वदा ही शिव पूजन होता है, उस स्थान पर जिस मनुष्य की मृत्यु होती है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है। जो मनुष्य शिव, शिव, शिव, इस प्रकार सर्वदा कहता रहता है, वह परम पवित्र और परम श्रेष्ठ हो जाता है और वह धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष को भी प्राप्त करता है।
‘शिव’ शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य के समस्त प्रकार के पापों का विनाश हो जाता है। अतः जो मनुष्य ‘शिव-शिव’ का उच्चारण करते हुए प्राणत्याग करता है, वह अपने करोड़ों जन्म के पापों से मुक्त होकर ‘शिवलोक’ को प्राप्त करता है।
‘शिव’ शब्द का अर्थ-कल्याण है। अतः जिसकी जिह्ना पर अहर्निश कल्याणकारी ‘शिव’ का नाम रहता है, उसका बाह्य और आभ्यन्तर दोनो ही शुद्ध हो जाते हैं और वह शिवजी की समीपता का अधिकारी बन जाता है। ‘शिव’ यह दो अक्षरों वाला नाम ही परब्रह्मस्वरूप एवं तारक है, इससे भिन्न और कोई दूसरा तारक ब्रह्म नहीं है-

Monday, April 16, 2012

संस्कृत महा विद्यालय


।। श्री गणेशाय नमः ।।  श्री सरस्वत्यै नमः।। श्री वेद पुरुषाय नमः।।
।। श्री त्रिपुरसुन्दर्यै नमः ।। श्री वेद पुरुषाय नमः ।। श्री वेदान्त महागुरवे नमः ।।
निर्माणाधीन
श्रीत्रिपुरसुन्दरी शक्ति समिति
त्रिपुरसुन्दरी स्वशासी संस्कृत महा विद्यालय श्रीधाम वृन्दावन जिला मथुरा (उ.प्र.)
संस्थापक : आचार्य धीरेन्द्र
भगवान् श्री राधाकृष्ण की विहार स्थली में विद्यादान का एक संकल्पः-
कोई धन दान करता है, कोई वस्त्र दान करता है, तो कोई भूमि दान करता है लेकिन विद्यादान के विषय में अब विचार करना चाहिए। क्योकि आजके बदलते युग में परम्परागत देवभाषा, कहें तो संस्कृत भाषा का प्रायः लोप होता दिखाई दे रहा है। हम चाहते तो हैं कि हमारे घर विद्वान् ब्राह्मण आएँ और पूजन-पाठ कराएँ, यह तो तभी संभव हो सकता है जब हम संकल्प लें कि इस महाविद्या का दान करेंगे, वास्तव में यदि संस्कृत को आगे बढ़ाएँगे तो निश्चित रूप से समाज एवं राष्ट्र भी आगे बढ़ेगा। क्योंकि संस्कृत का अर्थ ही है संस्कार प्रदान करना और धर्म को आगे बढ़ाना।
हमने जाकर अनेकानेक तीर्थों में निरीक्षण किया है और वहाँ पता चला है कि यदि पढनें का स्थान है तो रहनें का नहीं है| रहनें का स्थान है तो पढ़नें का नहीं है। कदाचित रहनें और पढ़नें का स्थान है तो भोजन की कोई व्यवस्थाएँ नहीं हैं।
अतः हमारी यह अभिलाषा है कि गरीब ब्राह्मण बालकों को वह सब कुछ मिले जो वेद आदि के अध्ययन में सहयोग प्रदान करते हैं। जैसेः- पढ़ाने के लिए योग्य विद्वान, वस्त्र, भोजन व्यवस्था, रहनें की सुविधा, आदि।
यह संकल्प तभी पूर्ण हो सकता है जब आप भी हमारे विचारों से सहमत होंगे, और हमारा साथ देंगे।।
जय श्री कृष्ण
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सदस्यता शुल्क:
मासिक : 100
वार्षिक : 1200
संकल्प हम सबका
आचार्य धीरेन्द्र
117 गोविन्द खण्ड विश्वकर्मा नगर झिलमिल कालोनी शाहदरा दिल्ली 110095
फोन नं. 9871662417-9210067801
Email: kanhadarshan@gmail.com/web:www.tripursundari.org

Friday, March 23, 2012

अंतरिक्ष में अद्भुत दृश्य


अंतरिक्ष में अद्भुत दृश्य 


6 जून 2012 बुधवार प्रातः काल 03:40 से 10:19 के बीच सूर्य एवं शुक्र का अभुत समागम देख सकते हैं, आकाशीय गतिविधियों को खुली आंखों से न देखें।

Monday, March 19, 2012

स्मरण


स्मरण

  • ईश्वर सभी को उसकी जरूरत के हिसाब से देता है।
  • मनुष्य जिस सीमा तक अपने आपको दुखी मानता है, उतना दुःखी है।
  • हम मुँह से तो कहते हैं कि हम ईश्वर को मानते हैं, पर भीतर से अपने ऊपर ही भरोसा करते हैं।
  • जैसी संगति करोगे वैसे ही बन जाओगे।
  • अपनी बुद्धि और पराया धन कई गुणा दीखता है।
  • प्रिय वचन बोलने वाले के लिए कोई पराया नहीं है।
  • मनुष्य को बोलने पर अक्सर खेद होता है, चुप रहने पर कभी नहीं।
  • लोग आपको अच्छा कहें या न कहें, परन्तु यदि आपके विचार अच्छे हैं तो सदैव प्रसन्न रहेंगे, यह निश्चित है।
  • जवानी में हम सीखते हैं और प्रौढावस्था में समझते हैं।
  • बुद्धिमान शत्रु भी मूर्ख मित्र से अच्छा होता है।
  • भार हल्का हो जाता है, यदि प्रसन्नता पूर्वक उठाया जाये।
  • लकड़ी में सुराख करने वाला यन्त्रा कमल में सुराख नहीं कर सकता।
  • भूलकर भी अपने पड़ोसी का अहित कभी नहीं करना चाहिए।
  • एक पल का क्रोध तुम्हारा भविष्य बिगाड़ सकता है।
  • निराशा मूर्खों का निष्कर्ष है। 
  • प्रसन्न चित्त मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है।
  • केवल मूर्ख और मृतक ये दो ही अपने विचार नहीं बदलते। 

Thursday, February 2, 2012

भारतीय संस्कृति


संस्कृतम्
भाषाओं के इतिहास में भारतवर्ष का एवं यहाँ के आचार्यों का योगदान महत्त्वपूर्ण रहा है, क्यों कि? उन्होंने ऐसी भाषा का आविष्कार किया जो हर तरह से शास्त्रीय है। वह देवभाषा ‘संस्कृत’ है जिसके बल पर भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता महान् बनी।

आचार्य धीरेन्द्र जी महाराज 

शयन, उपवेशन, नेत्रपाणि प्रकाशन, गमन, आगमन, सभा वास, आगम, भोजन, नृत्य लिप्सा, कौतुक, निद्रा-अवस्था-कथन

  शयन , उपवेशन , नेत्रपाणि प्रकाशन , गमन , आगमन , सभा वास , आगम , भोजन , नृत्य लिप्सा , कौतुक , निद्रा-अवस्था-कथन   शयनं चोपवेशं च नेत्र...