Sunday, 29 January 2012

श्रीमद्भागवत्


श्रीमद्भागवत्
श्रीमद्भागवतं पुराण तिलकं यद्वैष्‍णवानां धनम्,
यस्‍मिन् पारमहंस्यमेकममलं ज्ञानं परं गीयते।
तत्र ज्ञान-विराग-भक्‍ति सहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतम्,
तच्छृण्वन् विपठन् विचारणपरो भक्‍त्या विमुच्येन्नरः।।

  • श्रीमद्भागवत् महापुराण सर्वोत्तम साधनों का निर्देश करता है।
  • श्रीमद्भागवत् महापुराण की भाषा अत्यन्त कठिन है।
  • श्रीमद्भागवत् महापुराण को किसी योग्य आचार्य द्वारा ही समझा जा सकता है।
  • श्रीमद्भागवत् महापुराण का श्रवण अनेक जन्मों के पुण्य जब एकत्रित होते हैं तब ही सुलभ हो पाता है।



श्रीमद्भागवत् महापुराण एक ऐसा पुराण है, जिसकी महिमा अध्यात्म जगत् में अत्यन्त प्रख्यात है, महर्षि वादरायण ने इसे " निगमकल्पतरोर्गलितं फलम्" कहा है। अर्थात् वेद कल्पवृक्ष के समान है। कल्पवृक्ष की सन्‍निधि में पहुँचा हुआ पुरुष जो-जो कामना करता है उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। वेद रूपी कल्पवृक्ष भी ऐसा ही है। संसारी मनुष्यों की सारी कामना को पूर्ण करने के उपायों का निर्देश वेद करते हैं। लौकिक एवं पारलौकिक समस्त कामनाओं की पूर्ति वेदार्थों के अनुष्ठान से संभव है। वेदों की दृष्‍टि में संसार में समस्त प्राणियों का कल्याण आवश्यक है। वह किसी व्यक्‍ति विशेष अथवा जाति विशेष को अपना विषय नहीं बनाता है। वेद यदि आस्‍तिक पुरुषों को स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्‍ति के साधनों का निर्देश "स्वर्गकाम अश्वमेधेन यजेत्" इत्यादि वाक्यों के द्वारा करता है तो वह किसी भी नास्‍तिक व्यक्‍ति के लिये मारण-मोहन-उच्चाटन जैसे अभिचार कार्मों की पूर्ति के साधनों को बतलाकर तथा अभिचार कर्मजन्य पापादृष्‍टि का निर्देश करके उन्हें सत्मार्ग पर प्रवृत्त करने का सफल प्रयास करता है। इन्हीं समस्त बातों को दृष्‍टि पथ में रखकर भगवत्पाद रामानुजाचार्य कहते हैं "अखिलजगद्घितानुशासनश्रुतिः।"  अर्थात् वेद सम्पूर्ण जगत् के कल्याण का उपदेश करते हैं। श्रीवैष्‍णव विद्वानों का मानना है कि वेद के कर्मकाण्ड भाग में श्रीभगवान् की आराधना का प्रकार बतलाया गया है तथा उसके उत्तरभाग में जीवात्मा के स्वरूप, परमात्मा के स्वरूप, परमात्मा की प्राप्‍ति के साधन, परमात्मा की प्राप्‍ति में बाधक तत्व तथा परमात्मा की प्रप्‍ति के फल का निर्देश किया गया है। अतएव मानव शरीर प्राप्त करने के पश्चात् मनुष्य ने यदि इन पाँच बातों को जान लिया तब तो उसका जीवन सफल हो गया और इस जीवन में मानव इन बोतों को जाने बिना ही केवल सांसारिक भोगों में ही समस्त समय बिता दिया। तब तो उसका जीवन व्यर्थ चला गया। ऐसी ही धारणा से श्रुति कहती है-जिस तरह वृक्ष का अपने आप पककर गिरा हुआ फल अत्यन्त स्वादिष्ट एवं मधुर होता है, उसी तरह वेद वृक्ष का सार स्वरस परिपूर्ण फल के समान अत्यन्त मनोहर ग्रन्‍थ है यह श्रीमद्भागवत् महापुराण ।
श्रीमद्भागवत् महापुराण संपूर्ण वेदार्थ का उपबृंहण ग्रंथ है। "वेदार्थो निश्चेतव्यः स्मृतीतिहासपुराणैः" (श्रीवचनभूषण) इस सूत्र के अनुसार यह वेदार्थ का निर्णायक ग्रन्‍थ है। इसमें आत्मोज्जीवन के सवोऱ्त्तम साधनों का निर्देश किया गया है। 
यद्यपि धर्म, अर्थ, काम ये त्रिवर्ग जीवन के लिये अत्यन्त आवश्यक हैं क्योंकि इनके बिना सामान्य मानव की जीवन यात्रा नहीं चल सकती। किन्तु मोक्ष तो मानव जीवन का चरम पुरुषार्थ है। मानव जीवन एक ऐसा जीवन है जिसमें मोक्ष प्राप्‍ति के साधनों का अनुष्ठान अत्यन्त सरल है। गोस्वामी श्रीतुलसीदास ने तो मानव-जीवन को मोक्ष का द्वार कहा है। जिस तरह दरवाजे पर पहुँचकर अपने आश्रय घर में न घुस पाना बहुत बडी भूल मानी जाती है, उसी तरह से मानव जीवन प्राप्त करके मोक्ष को प्राप्त किये बिना अपना जीवन समाप्त कर देना मानव जीवन की सबसे बडी क्षति है।
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। जो न पाइ परलोक सुधारा।।
यद्यपि आत्मकल्याण के अनेक साधन बतलाये गये हैं; किन्तु उन साधनों का अनुष्ठान कलियुग में असम्‍भव नहीं तो अत्यन्त कठिन अवश्य है। श्रीमद्भागवत पुराण मोक्ष प्रदान करने का सरलतम तथा सर्वोत्तम साधन है। इसका पाठ श्रवण तथा अर्थ श्रवण, मानव जीवन में ऐसा परिवर्तन ला देता है कि मनुष्य स्वभावतः परमार्थ चिन्तन में प्र में प्रवृत्त हो जाता है। श्रीमद्भागवत् महापुराण के श्रवण मात्र से अनेक प्रकार के पापियों की शुद्घि हो जाती है।
सर्वदा तरह-तरह के पाप करते रहने वाले, दुराचारी, कुमार्गगामी, क्रोधी, कुटिल प्रकृति के कामी झूठ बोलने वाले, माता-पिता की निन्दा करने वाले, लालची, अपने आश्रम का त्याग करने वाले, घमण्डी, दूसरों की उन्नति देखकर जलने वाले, दूसरों को पीडा पहुँचाने वाले, मदिरा पीने वाले, ब्रह्महत्या करने वाले, सोना चुराने वाले, गुरु-पत्नी के साथ व्यभिचार करने वाले तथा विश्वासघात करने वाले, छल प्रपञ्च करने वाले, क्रूर, पिशाच के समान निर्दय ब्राह्मण के धन को खाने वाले, सदा मन, कर्म एवं वाणी से पाप करने वाले, दूसरों की संपत्ति हड़पने वाले, मलिन मन तथा दुष्ट हृदय वाले भी जीव कलियुग में सप्ताह विधि से श्रीमद्भागवत् महापुराण  का श्रवण करके पवित्र हो जाते हैं। 
किन्तु इसके लिये अपेक्षा इस बात की है कि श्रीमद्भागवत सप्ताह में पाठ का श्रवण अवश्य किया जाय। पाठ सुन लेने के पश्चात् ही श्रीमद्भागवत् महापुराण  के अर्थ को सुनकर उसका मनन एवं चिन्तन करें। श्रीमद्भागवत् महापुराण के पाठ की बड़ी महिमा है। भागवतजी के श्रवण से ही धुन्‍धुकारी जैसा प्रेत, प्रेत की योनि से छूटकर मुक्ति प्राप्तकर बैकुण्ठ का अधिकारी बना। गोकर्ण के पिता आत्मदेव श्रीमद्भागवत् महापुराण  के दशम स्कन्‍ध का प्रतिदिन पाठ करके मुक्त हो गये।
व्यासजी महाभारत जैसे ग्रन्‍थ तथा अन्य पुराणों की रचना करके भी जब अपने मन में शान्‍ति का अनुभव नहीं कर रहे थे तो नारदजी उन्हें श्रीमद्भागवत् महापुराण का प्रणयन करने के लिये कहा और ऐसा करके श्रीव्यासजी ने परम शान्‍ति का अनुभव किया।
श्रीमद्भागवत् महापुराण यदि पाण्‍डित्य परीक्षा का साधन है तो दूसरी तरफ जीवात्मा एवं उसके प्राप्य परमात्मा के स्वरूप एवं सम्बन्‍धों का स्पष्टतम निरूपण है। यदि यह पुराण पारमहंस्य संहिता होने के कारण निवृत्त धर्म का समर्थन करता है तो दूसरी तरफ यह एक सामान्य मनुष्य को भी मोक्ष पद तक प्राप्त करने के सरलतम साधनों का निर्देश करता है। अजामिल जैसा पापी पुरुष भी अन्‍तिम समय में भगवन्नाम का उच्चारण करके अपना आत्म कल्याण कर लेता है।
यह एक ऐसा पुराण है जो भगवान् और भक्त दोनों की समुचित रूप से चर्चा करता है।
यद्यपि श्रीमद्भागवत् की दृष्‍टि से भगवान् श्री कृष्‍ण ही शुभाश्रय हो सकते हैं। किसी भी श्रेणी का जीव शुभाश्रय नहीं हो सकता है किन्तु परमात्मा की आराधना की पूर्ति में भगवद् भक्तों  की आराधना का बड़ा ही महत्त्व है। क्योंकि भगवद् भक्त ही जिज्ञासु अथवा अधिकारी को परमात्माराधना के मार्ग पर प्रवृत्त करने में सहायक होते हैं। ये भगवद् भक्त ऐसे महापुरुष हैं जो अपनी आराधना के बल पर श्रीकृष्‍ण की कृपा के पात्र बन चुके हैं। ऐसे महापुरुषों का संयोग तो तब ही संभव हो पाता है जबकि अधिकारी का बहुत अधिक पुण्य उपार्जित हो जाय अथवा उस पर भगवान् श्रीकृष्‍ण की कृपा हो जाय। यह सत्संगति परमात्म कृपैकलभ्य है ऐसा श्रीरामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी लिखा है-
सत्संगति महिमा नहीं गोई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
श्रीमद्भागवत् महापुराण में स्‍थान-स्‍थान पर सत्संगति की महिमा बतलायी गयी है। बालक नारद जी को परमात्म-स्वरूप का ज्ञान सन्त या महापुरुषों की सत्संगति से ही होता है। श्रीव्याजीमहाराज को भी  मनःसन्तोष श्रीनारदजी के ही सत्संगति से हुई है। धुवजी के परमात्माराधन का मार्ग आचार्य नारद ही प्रशस्त करते हैं। अतएव आचार्य की प्राप्‍ति अथवा सत्संति की प्राप्‍ति तो बड़े सौभाग्य से होती है।
सत्संग‌ की ऐसी महिमा है कि उसके द्वारा आत्मकल्याण कामी पुरुष सांसारिक भोगों से विषण्‍ण हो जाता है तथा उसका मन परमात्मा में लग जाता है। इसके पश्चात् जीव सदाचार्य का वरण करके परमात्मा को ही एक मात्र रक्षक के रूप में अपना लेता है।
इस तरह स्पष्ट है कि श्रीमद्भागवत् ग्रन्‍थ मोक्ष चाहने वाले आत्मकल्याण कामियों को चाहिये कि वे इसको अपने कल्याण के लिए अवश्य अपनाएँ तथा श्रीमद्भागवत् जी में बतलाए गये अर्थें का चिन्तन एवं मनन करें।
कृष्‍णप्राप्‍तिकरं शश्वत् प्रेमानन्दफलप्रदम्। श्रीमद्भागवतं शास्‍त्रं कलौ कीरेणभाषितम्।।


।। जयश्रीकृष्‍ण ।।

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