Sunday, 29 January 2012

वास्तुशास्‍त्र



वास्तुशास्‍त्र

ब्रह्माजी के मानस पुत्र श्रीविश्वकर्माजी की मानव मात्र को वास्तुशास्‍त्र की अभूतपूर्व देन है। ज्योतिष शास्‍त्र के अंतर्गत वास्तुशास्‍त्र का एक महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी भवन का निर्माण करते समय उसे वास्तुशास्‍त्र के अनुकूल ही बनाना चाहिये। क्योंकि घर में सुख, शांति एवं समृद्धि आदि इसी पर आधारित है। वास्तु दोष होने पर भवन में कई प्रकार की परेशानियाँ, बनी रहती हैं।
वास्तुशास्‍त्र की महिमा एवं उपयोग
वास्तु देवता प्रत्येक घर में स्‍थाई रूप से निवास करते हैं और एवमस्तु, एवमस्तु, एवमस्तु (ऐसा ही हो, ऐसा ही हो, ऐसा ही हो); इस प्रकार से वास्तु भगवान् निरन्तर उच्चारण करते रहते हैं। उदाहरणार्थ जैसे हमने कहा-कि हमारे पास अमुक वस्तु नहीं है और वह वस्तु आपके पास है तो इस स्‍थिति में भगवान् वास्तु पुरुष ने कह दिया कि ऐसा ही हो। फलस्वरूप जो वस्तु आपके पास है, आपके नकारात्मक भावना से उस वस्तु का अभाव हो जायेगा। और उदाहरणार्थ-आपके पास कोई व्यक्‍ति आया और आपसे पूँछा कि आप कैसे हो? वस्तुतः आप दुःखी हो लेकिन आने उत्तर में कहा-कि मैं तो भगवान् की कृपा से बहुत सुखी हूँ; आपके इस सकारात्मक भावना से वास्तु पुरुष ने कह दिया कि एवमस्तु (ऐसा ही हो) इस स्‍थिति में वास्तु भगवान् की कृपा से आपका बिना परिश्रम के ही कल्याण हो गया।
कहने का अभिप्राय यह है कि आप अपने घर में कभी भी नकारात्मक (निगेटिव) भावना मत रखिये, कभी किसी को गलत मत कहिये, घर कभी किसी की निन्दा मत करिये। क्योंकि घर एक मन्‍दिर होता है और मन्‍दिर में भगवान् का निवास होता है। मन्‍दिर में हम सभी न तो गलत करते हैं, न गलत शब्दों का प्रयोग करते हैं, नही नकारात्मक भावना रखते हैं। श्रीरामचरित मानस के सुन्दरकाण्ड में स्पष्टरूप से लिखा है कि-
मन्‍दिर-मन्‍दिर प्रतिकरि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
श्री हनुमानजी महाराज ने लंका में जाकर प्रत्‍येक घर में जाकर देखा तो वहाँ अनगिनत योद्घा दिखाई दिये। यहाँ मन्‍दिर का अर्थ भवन ही है नहीं तो मन्‍दिर में योद्घाओं का क्या काम? मन्‍दिर में तो भगवान श्रीरामजी रहते हैं, भगवान् श्रीकृष्‍ण विराजते हैं, भगवती माँ वैष्‍णों देवी विराजती हैं।
भवन का निर्माण करने पर प्रत्येक मनुष्य को एक प्रकार की आत्‍मिक शान्‍ति एवं सुख प्राप्त होता है, उसे ऐसा आभास होने लगता है कि जैसे उसने कोई बहुत बड़ी उपलब्‍धि प्राप्त कर ली हो। भवन (घर) निर्माण को एक प्रकार का धार्मिक कृत्य भी माना गया है क्योंकि इसका उपयोग पीढ़ी दर पीढ़ी तक होता है।
वास्तु दोष होने पर समय-समय पर भवन में परिवर्तन करना पड़ता है। ऐसी मान्यता है कि वास्तु शास्‍त्र नियमों के अनुसार भवन में परिवर्तन या परिवर्धन किया जाये तो घर में सुख शान्‍ति बनी रहती है। वास्तु शास्‍त्र के अनुसार भवन  बनवाते समय-परिवर्तन या परिवर्धन करते समय दिशाओं को ध्यान में रखते हुए करना चाहिये। अपने भवन में कोई भी व्यक्‍ति कुछ भी परिवर्तन कर सकता है। जिस तरह बने हुए भवनों में वास्तु के दोषों को साधारण परिवर्तनों के द्वारा सुधारा जा सकता है उसी तरह यदि आपका भवन वास्तु सिद्घान्तों के अनुसार बनाया गया है और बाद में वास्तु सिद्घान्तों पर ध्यान न देते हुए उसमें परिवर्तन कर लिया जाय तो वास्तु दोष का प्रभाव घर-परिवार पर निश्‍चित रूप से दिखाई देता है, इसलिये कुछ वास्तु सम्बन्‍धी बातों की जानकारी भी अति आवश्यक है।
मकान में कोई नया परिवर्तन करना हो तो दक्षिण, पश्‍चिम में दक्षिण क्षेत्र के भाग में जोड़कर ना बढ़ाएँ। साथ ही इस तरह नया निर्माण पश्‍चिम की ओर है, तो भवन का कोई भी परिवर्तन या निर्माण उत्तर, पश्‍चिम उत्तर की ओर ना करें।
कभी भूमि खरीदने के पश्चात् या अधूरा मकान लेने के पश्चात् उसके निर्माण में विलम्ब हो ही जाता है। अतः ऐसी परिस्‍थिति में इन वास्तु नियमों को ध्यान में रखें-
अधूरे निर्माण में साधारण परिवर्तन करने के पश्चात् अनावश्यक कार्य भी बढ़ जाते हैं। घर को व्यवस्‍थित करने का कार्य महिलाओं का होता है, अतः रसोई घर का चूल्हा आग्नेय कोण में होना चाहिये। यदि स्‍थान परिवर्तन करना संभव नहीं है तो स्लैब के नीचे ताँबे के पात्र में जल भरकर अवश्य रखें। ऐसे ही वास्तु शास्‍त्र के अनेक नियम एवं उपाय हैं जिसके करने मात्र से मनुष्य सुखमय जीवन व्यतीत कर सकता है।
आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण का कोना) में रसोईघर होना चाहिए किन्तु ऐसा न होने पर अग्नि की पुष्टि नहीं हो पाती है। इसके निवारण के लिए हम घर की इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं को जैसे फ्रीज, टी.वी. इत्यादि को इस कोने में रखकर इसे पुष्ट बना सकते हैं। इसी प्रकार घर की पूर्व एवं उत्तर दिशा को खाली रखा जाना चाहिए। अगर ऐसा संभव न हो तो पूर्व या उत्तर दिशा में रखी वस्तुओं के वजन से लगभग डेढ़ गुना वजन नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) या दक्षिण दिशा में रखा जाना चाहिए क्योंकि नैऋत्य कोण भारी एवं ईशान कोण (पूर्व-उत्तर) हलका होना चाहिए। इसी प्रकार घर की घड़ियों को हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा में लगाया जाना जाना चाहिए इससे अच्छे समय के आगमन के व्यवधान समाप्त होते हैं। ईशान कोण पवित्र एवं स्वच्छ रखा जाना चाहिए एवं एक घड़ा जल भरकर इस कोने में रखना चाहिए, इसके सत्परिणाम मिलते हैं।
सभी महत्वपूर्ण कागजों को पूर्व या उत्तर दिशा में रखा जाना चाहिए ऐसा न करने से इनसे संबंधित घटनाएँ अहितकारी रहती हैं। इस प्रकार घर के शयन कक्ष, पूजा-स्थल, तिजोरी, बाथरूम, बैठक-स्थल, भोजन-कक्ष, मुख्य द्वार एवं खिड़की आदि में परिवर्तन कर वास्तु दोष ठीक कर जीवन में सफलता प्राप्त की जा सकती है।
समचे ब्रह्माण्ड में अनन्त शक्‍तियाँ हैं जिससे सृष्‍टि, स्‍थिति (पालन) और प्रलय आदि की प्रक्रिया चलती रहती है।वास्तु शास्‍त्र में पंच महाभूतों के साथ प्रकृति की तीन शक्‍तियों पर विचार किया जाता है। 1. गुरुत्वशक्‍ति, 2.चुम्बकीय शक्‍ति, 3.सौरऊर्जा
इन्हीं तीनों शक्‍तियों से प्रकृति की कार्य प्रणाली चलती है।

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