Monday, 19 March 2012

स्मरण


स्मरण

  • ईश्वर सभी को उसकी जरूरत के हिसाब से देता है।
  • मनुष्य जिस सीमा तक अपने आपको दुखी मानता है, उतना दुःखी है।
  • हम मुँह से तो कहते हैं कि हम ईश्वर को मानते हैं, पर भीतर से अपने ऊपर ही भरोसा करते हैं।
  • जैसी संगति करोगे वैसे ही बन जाओगे।
  • अपनी बुद्धि और पराया धन कई गुणा दीखता है।
  • प्रिय वचन बोलने वाले के लिए कोई पराया नहीं है।
  • मनुष्य को बोलने पर अक्सर खेद होता है, चुप रहने पर कभी नहीं।
  • लोग आपको अच्छा कहें या न कहें, परन्तु यदि आपके विचार अच्छे हैं तो सदैव प्रसन्न रहेंगे, यह निश्चित है।
  • जवानी में हम सीखते हैं और प्रौढावस्था में समझते हैं।
  • बुद्धिमान शत्रु भी मूर्ख मित्र से अच्छा होता है।
  • भार हल्का हो जाता है, यदि प्रसन्नता पूर्वक उठाया जाये।
  • लकड़ी में सुराख करने वाला यन्त्रा कमल में सुराख नहीं कर सकता।
  • भूलकर भी अपने पड़ोसी का अहित कभी नहीं करना चाहिए।
  • एक पल का क्रोध तुम्हारा भविष्य बिगाड़ सकता है।
  • निराशा मूर्खों का निष्कर्ष है। 
  • प्रसन्न चित्त मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है।
  • केवल मूर्ख और मृतक ये दो ही अपने विचार नहीं बदलते। 

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