Saturday, April 28, 2012


शिवपूजन के लिये विशेष तथ्य

कामना भेद से रुद्राभिषेक द्रव्य

१. जल से अभिषेक करने पर शीघ्र ही वृष्टि होती है, एवं ज्वर भी शान्त होता है।
२. कुशोदक से अभिषेक करने पर व्याधियों का शमन होता है।
३. दधि से अभिषेक करने पर पशु आदि की प्राप्ति होती है।
४. गन्ने के रस से अभिषेक करने पर लक्ष्मी की सिद्धि प्राप्त होती है।
५. मधु से अभिषेक करने पर धन की प्राप्ति होती है।
६. तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
७. दूध से अभिषेक करने पर शीघ्र ही पुत्र की प्राप्ति होती है,  और प्रमेह रोग भी नष्ट होता है।
८. घी की धारा से सहस्र नोमों से अभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।
९. शर्करा मिश्रित दूध से अभिषेक करने पर जड बुद्धि भी श्रेष्ठ बुद्धि में परिवर्तित हो जाती है।
१ॉ. सर्षों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रुओं का शमन होता है।
११. शिवजी का अभिषेक गो शृङ्ग से करना चाहिये (शिवं गवयशृङ्गेण)।
१२. शिवजी के अभिषेक के लिये यजुर्वेदोक्त रुद्री प्रशस्त मानी गयी है।
१३. पवित्र मनुष्य सदा ही उत्तराभिमुख होकर शिवार्चन करें।
१४. मृत्तिका, भस्म, गोबर, आटा, ताँबा और कांस का शिवलिङ्ग बानाकर जो मनुष्य एकबार भी पूजन करता है वह अयुतकल्प तक स्वर्ग में वास करता है।
१५. नौ, आठ, और सात अँगुल का शिवलिङ्ग उत्तम होता है। तीन, छः, पाँच तथा चार अँगुल का शिवलिङ्ग मध्यम होता है। तीन, दो, और एक अँगुल  का शिवलिङ्ग कनिष्ठ होता है। इस प्रकार यथा क्रम से चर प्रतिष्ठित शिवलिङ्ग नौ प्रकार का कहा गया है।
  १६. शूद्र, जिसका उपनयन सँस्कार नहीं हुआ है, स्त्री और पतित ये लोग केशव या शिव का स्पर्श करते हैं तो नरक प्राप्त करते हैं।                            (स्कन्द पुराण)
१७. स्वयं प्रदुर्भूत बाणलिंग में, रत्नलिंग में, रसनिर्मित लिंग में और प्रतिष्ठित लिंग  में चण्ड का अधिकार नहीं होता।
१८. जहाँ पर चण्डाधिकार होता है वहाँ पर मनुष्यों को उसका भोजन नहीं करना चाहिये। जहाँ चण्डाधिकार नहीं होता है वहाँ भक्ति से भोजन करें। 
(नि.सि.पृ.सं.७२ॉ)
१९. पृथिवी, सुवर्ण, गौ, रत्न, ताँबा, चाँदी, वस्त्रादि को छोड़कर चण्डेश के लिये निवेदन करें। अन्य अन्न आदि, जल, ताम्बूल, गन्ध और पुष्प, भगवान् शंकर को निवेदित किया हुआ सब चण्डेश को दे देना चाहिये।(नि.सि.पृ.सं.७१९)
२ॉ. विल्वपत्र तीन दिन और कमल पाँच दिन वासी नहीं होता और तुलसी वासी नहीं होती। (नि.सि.पृ.सं.७१८)
२१. अँगुष्ठ, मध्यमा और अनामिका से पुष्प चढ़ाना चाहिये एवं अँगुष्ठ-तर्जनी से निर्माल्य को हटाना चाहिये।


शिवलिङ्ग पूजन का प्रारम्भ एवं महत्त्व

शिवलिङ्ग के पूजन प्रारम्भ होने के सम्बन्ध में एक पौराणिकी कथा प्राप्त होती है कि-दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में शिवजी का भाग नहीं रखा, जिससे कुपित होकर सती पार्वती ने दक्ष के यज्ञमण्डप में योगाग्नि द्वारा अपना शरीर जलाकर प्राण त्याग कर दिया। सती के शरीर के त्यागे जाने का समाचार सुनकर शिवजी अत्यन्त कुपित हो गये और वे नग्नावस्था में पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे। एक दिन वह नग्नावस्था में ही ब्राह्मणों की बस्ती में पहुँच गये। शिवजी के नग्न स्वरूप को देखकर ब्राह्मणों की स्त्रियाँ भगवान् शिवजी पर मोहित हो गयीं। स्त्रियों की मोहावस्था को देखकर ब्राह्मणों ने शिवजी को शाप दिया कि ‘इनका लिङ्ग इनके शरीर से तत्काल गिर जाय।’ ब्राह्मणों के शाप के प्रभाव से लिङ्ग उनके शरीर से अलग होकर गिर गया, जिससे तीनों लोकों में घोर उत्पात होने लग गया। 
समस्त देव, ऋषि, मुनि व्याकुल होकर ब्रह्माजी की शरण में गये। ब्रह्माजी ने योगबल से शिव-लिङ्ग के अलग होने का कारण जान लिया और वह समस्त देवताओं, ऋषियों और मुनियों को अपने साथ लेकर शिवजी के समीप पहुँचे। ब्रह्माजी ने शिवजी से प्रार्थना की कि-‘आप अपने लिङ्ग को पुनः धारण कीजिये, अन्यथा तीनों लोक नष्ट हो जायेंगे। ब्रह्माजी की प्रार्थना सुनकर शिवजी बोले कि-आज से सभी लोग मेरे लिङ्ग की पूजा प्रारम्भ करदें, तो मैं पुनः अपने लिङ्ग को धारण कर लूँगा। शिवजी की बात सुनकर ब्रह्माजी ने सर्व प्रथम सुवर्ण का शिवलिङ्ग बनाकर उसका विधिवत् पूजन किया। पश्चात् देवताओं, ऋषियों और मुनियों ने अनेक द्रव्यों के शिव-लिङ्ग बनाकर पूजन किया। तभी से शिव-लिङ्ग के पूजन का क्रम प्रारम्भ हुआ।
जो मनुष्य किसी तीर्थ में तीर्थ की मिट्टी से शिवलिङ्ग बनाकर उनका हजार बार अथवा लाख बार अथवा करोड़ बार सविधि पूजन करता है, तो वह साधक शिवस्वरूप हो जाता है।जो मनुष्य तीर्थ में मिट्टी, भस्म, गोबर अथवा बालू का शिवलिङ्ग बनाकर एक बार भी उसका सविधि पूजन करता है, वह साधक दस हजार कल्प तक स्वर्ग में निवास करता है।
शिव-लिङ्ग का विधिपूर्वक पूजन करने से मनुष्य सन्तान, धन, धान्य, विद्या, ज्ञान, सद्बुद्धि, दीर्घायु और मोक्ष को प्राप्त करता है।
जिस स्थान पर शिवलिङ्ग का पूजन होता है, वह तीर्थ न होने पर भी तीर्थ बन जाता है।
जिस स्थान पर सर्वदा ही शिव पूजन होता है, उस स्थान पर जिस मनुष्य की मृत्यु होती है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है। जो मनुष्य शिव, शिव, शिव, इस प्रकार सर्वदा कहता रहता है, वह परम पवित्र और परम श्रेष्ठ हो जाता है और वह धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष को भी प्राप्त करता है।
‘शिव’ शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य के समस्त प्रकार के पापों का विनाश हो जाता है। अतः जो मनुष्य ‘शिव-शिव’ का उच्चारण करते हुए प्राणत्याग करता है, वह अपने करोड़ों जन्म के पापों से मुक्त होकर ‘शिवलोक’ को प्राप्त करता है।
‘शिव’ शब्द का अर्थ-कल्याण है। अतः जिसकी जिह्ना पर अहर्निश कल्याणकारी ‘शिव’ का नाम रहता है, उसका बाह्य और आभ्यन्तर दोनो ही शुद्ध हो जाते हैं और वह शिवजी की समीपता का अधिकारी बन जाता है। ‘शिव’ यह दो अक्षरों वाला नाम ही परब्रह्मस्वरूप एवं तारक है, इससे भिन्न और कोई दूसरा तारक ब्रह्म नहीं है-

Monday, April 16, 2012

संस्कृत महा विद्यालय


।। श्री गणेशाय नमः ।।  श्री सरस्वत्यै नमः।। श्री वेद पुरुषाय नमः।।
।। श्री त्रिपुरसुन्दर्यै नमः ।। श्री वेद पुरुषाय नमः ।। श्री वेदान्त महागुरवे नमः ।।
निर्माणाधीन
श्रीत्रिपुरसुन्दरी शक्ति समिति
त्रिपुरसुन्दरी स्वशासी संस्कृत महा विद्यालय श्रीधाम वृन्दावन जिला मथुरा (उ.प्र.)
संस्थापक : आचार्य धीरेन्द्र
भगवान् श्री राधाकृष्ण की विहार स्थली में विद्यादान का एक संकल्पः-
कोई धन दान करता है, कोई वस्त्र दान करता है, तो कोई भूमि दान करता है लेकिन विद्यादान के विषय में अब विचार करना चाहिए। क्योकि आजके बदलते युग में परम्परागत देवभाषा, कहें तो संस्कृत भाषा का प्रायः लोप होता दिखाई दे रहा है। हम चाहते तो हैं कि हमारे घर विद्वान् ब्राह्मण आएँ और पूजन-पाठ कराएँ, यह तो तभी संभव हो सकता है जब हम संकल्प लें कि इस महाविद्या का दान करेंगे, वास्तव में यदि संस्कृत को आगे बढ़ाएँगे तो निश्चित रूप से समाज एवं राष्ट्र भी आगे बढ़ेगा। क्योंकि संस्कृत का अर्थ ही है संस्कार प्रदान करना और धर्म को आगे बढ़ाना।
हमने जाकर अनेकानेक तीर्थों में निरीक्षण किया है और वहाँ पता चला है कि यदि पढनें का स्थान है तो रहनें का नहीं है| रहनें का स्थान है तो पढ़नें का नहीं है। कदाचित रहनें और पढ़नें का स्थान है तो भोजन की कोई व्यवस्थाएँ नहीं हैं।
अतः हमारी यह अभिलाषा है कि गरीब ब्राह्मण बालकों को वह सब कुछ मिले जो वेद आदि के अध्ययन में सहयोग प्रदान करते हैं। जैसेः- पढ़ाने के लिए योग्य विद्वान, वस्त्र, भोजन व्यवस्था, रहनें की सुविधा, आदि।
यह संकल्प तभी पूर्ण हो सकता है जब आप भी हमारे विचारों से सहमत होंगे, और हमारा साथ देंगे।।
जय श्री कृष्ण
आज ही सदस्य बनें
सदस्यता शुल्क:
मासिक : 100
वार्षिक : 1200
संकल्प हम सबका
आचार्य धीरेन्द्र
117 गोविन्द खण्ड विश्वकर्मा नगर झिलमिल कालोनी शाहदरा दिल्ली 110095
फोन नं. 9871662417-9210067801
Email: kanhadarshan@gmail.com/web:www.tripursundari.org

Friday, March 23, 2012

अंतरिक्ष में अद्भुत दृश्य


अंतरिक्ष में अद्भुत दृश्य 


6 जून 2012 बुधवार प्रातः काल 03:40 से 10:19 के बीच सूर्य एवं शुक्र का अभुत समागम देख सकते हैं, आकाशीय गतिविधियों को खुली आंखों से न देखें।

Monday, March 19, 2012

स्मरण


स्मरण

  • ईश्वर सभी को उसकी जरूरत के हिसाब से देता है।
  • मनुष्य जिस सीमा तक अपने आपको दुखी मानता है, उतना दुःखी है।
  • हम मुँह से तो कहते हैं कि हम ईश्वर को मानते हैं, पर भीतर से अपने ऊपर ही भरोसा करते हैं।
  • जैसी संगति करोगे वैसे ही बन जाओगे।
  • अपनी बुद्धि और पराया धन कई गुणा दीखता है।
  • प्रिय वचन बोलने वाले के लिए कोई पराया नहीं है।
  • मनुष्य को बोलने पर अक्सर खेद होता है, चुप रहने पर कभी नहीं।
  • लोग आपको अच्छा कहें या न कहें, परन्तु यदि आपके विचार अच्छे हैं तो सदैव प्रसन्न रहेंगे, यह निश्चित है।
  • जवानी में हम सीखते हैं और प्रौढावस्था में समझते हैं।
  • बुद्धिमान शत्रु भी मूर्ख मित्र से अच्छा होता है।
  • भार हल्का हो जाता है, यदि प्रसन्नता पूर्वक उठाया जाये।
  • लकड़ी में सुराख करने वाला यन्त्रा कमल में सुराख नहीं कर सकता।
  • भूलकर भी अपने पड़ोसी का अहित कभी नहीं करना चाहिए।
  • एक पल का क्रोध तुम्हारा भविष्य बिगाड़ सकता है।
  • निराशा मूर्खों का निष्कर्ष है। 
  • प्रसन्न चित्त मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है।
  • केवल मूर्ख और मृतक ये दो ही अपने विचार नहीं बदलते। 

Thursday, February 2, 2012

भारतीय संस्कृति


संस्कृतम्
भाषाओं के इतिहास में भारतवर्ष का एवं यहाँ के आचार्यों का योगदान महत्त्वपूर्ण रहा है, क्यों कि? उन्होंने ऐसी भाषा का आविष्कार किया जो हर तरह से शास्त्रीय है। वह देवभाषा ‘संस्कृत’ है जिसके बल पर भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता महान् बनी।

आचार्य धीरेन्द्र जी महाराज 

Sunday, January 29, 2012

वास्तुशास्‍त्र



वास्तुशास्‍त्र

ब्रह्माजी के मानस पुत्र श्रीविश्वकर्माजी की मानव मात्र को वास्तुशास्‍त्र की अभूतपूर्व देन है। ज्योतिष शास्‍त्र के अंतर्गत वास्तुशास्‍त्र का एक महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी भवन का निर्माण करते समय उसे वास्तुशास्‍त्र के अनुकूल ही बनाना चाहिये। क्योंकि घर में सुख, शांति एवं समृद्धि आदि इसी पर आधारित है। वास्तु दोष होने पर भवन में कई प्रकार की परेशानियाँ, बनी रहती हैं।
वास्तुशास्‍त्र की महिमा एवं उपयोग
वास्तु देवता प्रत्येक घर में स्‍थाई रूप से निवास करते हैं और एवमस्तु, एवमस्तु, एवमस्तु (ऐसा ही हो, ऐसा ही हो, ऐसा ही हो); इस प्रकार से वास्तु भगवान् निरन्तर उच्चारण करते रहते हैं। उदाहरणार्थ जैसे हमने कहा-कि हमारे पास अमुक वस्तु नहीं है और वह वस्तु आपके पास है तो इस स्‍थिति में भगवान् वास्तु पुरुष ने कह दिया कि ऐसा ही हो। फलस्वरूप जो वस्तु आपके पास है, आपके नकारात्मक भावना से उस वस्तु का अभाव हो जायेगा। और उदाहरणार्थ-आपके पास कोई व्यक्‍ति आया और आपसे पूँछा कि आप कैसे हो? वस्तुतः आप दुःखी हो लेकिन आने उत्तर में कहा-कि मैं तो भगवान् की कृपा से बहुत सुखी हूँ; आपके इस सकारात्मक भावना से वास्तु पुरुष ने कह दिया कि एवमस्तु (ऐसा ही हो) इस स्‍थिति में वास्तु भगवान् की कृपा से आपका बिना परिश्रम के ही कल्याण हो गया।
कहने का अभिप्राय यह है कि आप अपने घर में कभी भी नकारात्मक (निगेटिव) भावना मत रखिये, कभी किसी को गलत मत कहिये, घर कभी किसी की निन्दा मत करिये। क्योंकि घर एक मन्‍दिर होता है और मन्‍दिर में भगवान् का निवास होता है। मन्‍दिर में हम सभी न तो गलत करते हैं, न गलत शब्दों का प्रयोग करते हैं, नही नकारात्मक भावना रखते हैं। श्रीरामचरित मानस के सुन्दरकाण्ड में स्पष्टरूप से लिखा है कि-
मन्‍दिर-मन्‍दिर प्रतिकरि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
श्री हनुमानजी महाराज ने लंका में जाकर प्रत्‍येक घर में जाकर देखा तो वहाँ अनगिनत योद्घा दिखाई दिये। यहाँ मन्‍दिर का अर्थ भवन ही है नहीं तो मन्‍दिर में योद्घाओं का क्या काम? मन्‍दिर में तो भगवान श्रीरामजी रहते हैं, भगवान् श्रीकृष्‍ण विराजते हैं, भगवती माँ वैष्‍णों देवी विराजती हैं।
भवन का निर्माण करने पर प्रत्येक मनुष्य को एक प्रकार की आत्‍मिक शान्‍ति एवं सुख प्राप्त होता है, उसे ऐसा आभास होने लगता है कि जैसे उसने कोई बहुत बड़ी उपलब्‍धि प्राप्त कर ली हो। भवन (घर) निर्माण को एक प्रकार का धार्मिक कृत्य भी माना गया है क्योंकि इसका उपयोग पीढ़ी दर पीढ़ी तक होता है।
वास्तु दोष होने पर समय-समय पर भवन में परिवर्तन करना पड़ता है। ऐसी मान्यता है कि वास्तु शास्‍त्र नियमों के अनुसार भवन में परिवर्तन या परिवर्धन किया जाये तो घर में सुख शान्‍ति बनी रहती है। वास्तु शास्‍त्र के अनुसार भवन  बनवाते समय-परिवर्तन या परिवर्धन करते समय दिशाओं को ध्यान में रखते हुए करना चाहिये। अपने भवन में कोई भी व्यक्‍ति कुछ भी परिवर्तन कर सकता है। जिस तरह बने हुए भवनों में वास्तु के दोषों को साधारण परिवर्तनों के द्वारा सुधारा जा सकता है उसी तरह यदि आपका भवन वास्तु सिद्घान्तों के अनुसार बनाया गया है और बाद में वास्तु सिद्घान्तों पर ध्यान न देते हुए उसमें परिवर्तन कर लिया जाय तो वास्तु दोष का प्रभाव घर-परिवार पर निश्‍चित रूप से दिखाई देता है, इसलिये कुछ वास्तु सम्बन्‍धी बातों की जानकारी भी अति आवश्यक है।
मकान में कोई नया परिवर्तन करना हो तो दक्षिण, पश्‍चिम में दक्षिण क्षेत्र के भाग में जोड़कर ना बढ़ाएँ। साथ ही इस तरह नया निर्माण पश्‍चिम की ओर है, तो भवन का कोई भी परिवर्तन या निर्माण उत्तर, पश्‍चिम उत्तर की ओर ना करें।
कभी भूमि खरीदने के पश्चात् या अधूरा मकान लेने के पश्चात् उसके निर्माण में विलम्ब हो ही जाता है। अतः ऐसी परिस्‍थिति में इन वास्तु नियमों को ध्यान में रखें-
अधूरे निर्माण में साधारण परिवर्तन करने के पश्चात् अनावश्यक कार्य भी बढ़ जाते हैं। घर को व्यवस्‍थित करने का कार्य महिलाओं का होता है, अतः रसोई घर का चूल्हा आग्नेय कोण में होना चाहिये। यदि स्‍थान परिवर्तन करना संभव नहीं है तो स्लैब के नीचे ताँबे के पात्र में जल भरकर अवश्य रखें। ऐसे ही वास्तु शास्‍त्र के अनेक नियम एवं उपाय हैं जिसके करने मात्र से मनुष्य सुखमय जीवन व्यतीत कर सकता है।
आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण का कोना) में रसोईघर होना चाहिए किन्तु ऐसा न होने पर अग्नि की पुष्टि नहीं हो पाती है। इसके निवारण के लिए हम घर की इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं को जैसे फ्रीज, टी.वी. इत्यादि को इस कोने में रखकर इसे पुष्ट बना सकते हैं। इसी प्रकार घर की पूर्व एवं उत्तर दिशा को खाली रखा जाना चाहिए। अगर ऐसा संभव न हो तो पूर्व या उत्तर दिशा में रखी वस्तुओं के वजन से लगभग डेढ़ गुना वजन नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) या दक्षिण दिशा में रखा जाना चाहिए क्योंकि नैऋत्य कोण भारी एवं ईशान कोण (पूर्व-उत्तर) हलका होना चाहिए। इसी प्रकार घर की घड़ियों को हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा में लगाया जाना जाना चाहिए इससे अच्छे समय के आगमन के व्यवधान समाप्त होते हैं। ईशान कोण पवित्र एवं स्वच्छ रखा जाना चाहिए एवं एक घड़ा जल भरकर इस कोने में रखना चाहिए, इसके सत्परिणाम मिलते हैं।
सभी महत्वपूर्ण कागजों को पूर्व या उत्तर दिशा में रखा जाना चाहिए ऐसा न करने से इनसे संबंधित घटनाएँ अहितकारी रहती हैं। इस प्रकार घर के शयन कक्ष, पूजा-स्थल, तिजोरी, बाथरूम, बैठक-स्थल, भोजन-कक्ष, मुख्य द्वार एवं खिड़की आदि में परिवर्तन कर वास्तु दोष ठीक कर जीवन में सफलता प्राप्त की जा सकती है।
समचे ब्रह्माण्ड में अनन्त शक्‍तियाँ हैं जिससे सृष्‍टि, स्‍थिति (पालन) और प्रलय आदि की प्रक्रिया चलती रहती है।वास्तु शास्‍त्र में पंच महाभूतों के साथ प्रकृति की तीन शक्‍तियों पर विचार किया जाता है। 1. गुरुत्वशक्‍ति, 2.चुम्बकीय शक्‍ति, 3.सौरऊर्जा
इन्हीं तीनों शक्‍तियों से प्रकृति की कार्य प्रणाली चलती है।

श्रीमद्भागवत्


श्रीमद्भागवत्
श्रीमद्भागवतं पुराण तिलकं यद्वैष्‍णवानां धनम्,
यस्‍मिन् पारमहंस्यमेकममलं ज्ञानं परं गीयते।
तत्र ज्ञान-विराग-भक्‍ति सहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतम्,
तच्छृण्वन् विपठन् विचारणपरो भक्‍त्या विमुच्येन्नरः।।

  • श्रीमद्भागवत् महापुराण सर्वोत्तम साधनों का निर्देश करता है।
  • श्रीमद्भागवत् महापुराण की भाषा अत्यन्त कठिन है।
  • श्रीमद्भागवत् महापुराण को किसी योग्य आचार्य द्वारा ही समझा जा सकता है।
  • श्रीमद्भागवत् महापुराण का श्रवण अनेक जन्मों के पुण्य जब एकत्रित होते हैं तब ही सुलभ हो पाता है।



श्रीमद्भागवत् महापुराण एक ऐसा पुराण है, जिसकी महिमा अध्यात्म जगत् में अत्यन्त प्रख्यात है, महर्षि वादरायण ने इसे " निगमकल्पतरोर्गलितं फलम्" कहा है। अर्थात् वेद कल्पवृक्ष के समान है। कल्पवृक्ष की सन्‍निधि में पहुँचा हुआ पुरुष जो-जो कामना करता है उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। वेद रूपी कल्पवृक्ष भी ऐसा ही है। संसारी मनुष्यों की सारी कामना को पूर्ण करने के उपायों का निर्देश वेद करते हैं। लौकिक एवं पारलौकिक समस्त कामनाओं की पूर्ति वेदार्थों के अनुष्ठान से संभव है। वेदों की दृष्‍टि में संसार में समस्त प्राणियों का कल्याण आवश्यक है। वह किसी व्यक्‍ति विशेष अथवा जाति विशेष को अपना विषय नहीं बनाता है। वेद यदि आस्‍तिक पुरुषों को स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्‍ति के साधनों का निर्देश "स्वर्गकाम अश्वमेधेन यजेत्" इत्यादि वाक्यों के द्वारा करता है तो वह किसी भी नास्‍तिक व्यक्‍ति के लिये मारण-मोहन-उच्चाटन जैसे अभिचार कार्मों की पूर्ति के साधनों को बतलाकर तथा अभिचार कर्मजन्य पापादृष्‍टि का निर्देश करके उन्हें सत्मार्ग पर प्रवृत्त करने का सफल प्रयास करता है। इन्हीं समस्त बातों को दृष्‍टि पथ में रखकर भगवत्पाद रामानुजाचार्य कहते हैं "अखिलजगद्घितानुशासनश्रुतिः।"  अर्थात् वेद सम्पूर्ण जगत् के कल्याण का उपदेश करते हैं। श्रीवैष्‍णव विद्वानों का मानना है कि वेद के कर्मकाण्ड भाग में श्रीभगवान् की आराधना का प्रकार बतलाया गया है तथा उसके उत्तरभाग में जीवात्मा के स्वरूप, परमात्मा के स्वरूप, परमात्मा की प्राप्‍ति के साधन, परमात्मा की प्राप्‍ति में बाधक तत्व तथा परमात्मा की प्रप्‍ति के फल का निर्देश किया गया है। अतएव मानव शरीर प्राप्त करने के पश्चात् मनुष्य ने यदि इन पाँच बातों को जान लिया तब तो उसका जीवन सफल हो गया और इस जीवन में मानव इन बोतों को जाने बिना ही केवल सांसारिक भोगों में ही समस्त समय बिता दिया। तब तो उसका जीवन व्यर्थ चला गया। ऐसी ही धारणा से श्रुति कहती है-जिस तरह वृक्ष का अपने आप पककर गिरा हुआ फल अत्यन्त स्वादिष्ट एवं मधुर होता है, उसी तरह वेद वृक्ष का सार स्वरस परिपूर्ण फल के समान अत्यन्त मनोहर ग्रन्‍थ है यह श्रीमद्भागवत् महापुराण ।
श्रीमद्भागवत् महापुराण संपूर्ण वेदार्थ का उपबृंहण ग्रंथ है। "वेदार्थो निश्चेतव्यः स्मृतीतिहासपुराणैः" (श्रीवचनभूषण) इस सूत्र के अनुसार यह वेदार्थ का निर्णायक ग्रन्‍थ है। इसमें आत्मोज्जीवन के सवोऱ्त्तम साधनों का निर्देश किया गया है। 
यद्यपि धर्म, अर्थ, काम ये त्रिवर्ग जीवन के लिये अत्यन्त आवश्यक हैं क्योंकि इनके बिना सामान्य मानव की जीवन यात्रा नहीं चल सकती। किन्तु मोक्ष तो मानव जीवन का चरम पुरुषार्थ है। मानव जीवन एक ऐसा जीवन है जिसमें मोक्ष प्राप्‍ति के साधनों का अनुष्ठान अत्यन्त सरल है। गोस्वामी श्रीतुलसीदास ने तो मानव-जीवन को मोक्ष का द्वार कहा है। जिस तरह दरवाजे पर पहुँचकर अपने आश्रय घर में न घुस पाना बहुत बडी भूल मानी जाती है, उसी तरह से मानव जीवन प्राप्त करके मोक्ष को प्राप्त किये बिना अपना जीवन समाप्त कर देना मानव जीवन की सबसे बडी क्षति है।
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। जो न पाइ परलोक सुधारा।।
यद्यपि आत्मकल्याण के अनेक साधन बतलाये गये हैं; किन्तु उन साधनों का अनुष्ठान कलियुग में असम्‍भव नहीं तो अत्यन्त कठिन अवश्य है। श्रीमद्भागवत पुराण मोक्ष प्रदान करने का सरलतम तथा सर्वोत्तम साधन है। इसका पाठ श्रवण तथा अर्थ श्रवण, मानव जीवन में ऐसा परिवर्तन ला देता है कि मनुष्य स्वभावतः परमार्थ चिन्तन में प्र में प्रवृत्त हो जाता है। श्रीमद्भागवत् महापुराण के श्रवण मात्र से अनेक प्रकार के पापियों की शुद्घि हो जाती है।
सर्वदा तरह-तरह के पाप करते रहने वाले, दुराचारी, कुमार्गगामी, क्रोधी, कुटिल प्रकृति के कामी झूठ बोलने वाले, माता-पिता की निन्दा करने वाले, लालची, अपने आश्रम का त्याग करने वाले, घमण्डी, दूसरों की उन्नति देखकर जलने वाले, दूसरों को पीडा पहुँचाने वाले, मदिरा पीने वाले, ब्रह्महत्या करने वाले, सोना चुराने वाले, गुरु-पत्नी के साथ व्यभिचार करने वाले तथा विश्वासघात करने वाले, छल प्रपञ्च करने वाले, क्रूर, पिशाच के समान निर्दय ब्राह्मण के धन को खाने वाले, सदा मन, कर्म एवं वाणी से पाप करने वाले, दूसरों की संपत्ति हड़पने वाले, मलिन मन तथा दुष्ट हृदय वाले भी जीव कलियुग में सप्ताह विधि से श्रीमद्भागवत् महापुराण  का श्रवण करके पवित्र हो जाते हैं। 
किन्तु इसके लिये अपेक्षा इस बात की है कि श्रीमद्भागवत सप्ताह में पाठ का श्रवण अवश्य किया जाय। पाठ सुन लेने के पश्चात् ही श्रीमद्भागवत् महापुराण  के अर्थ को सुनकर उसका मनन एवं चिन्तन करें। श्रीमद्भागवत् महापुराण के पाठ की बड़ी महिमा है। भागवतजी के श्रवण से ही धुन्‍धुकारी जैसा प्रेत, प्रेत की योनि से छूटकर मुक्ति प्राप्तकर बैकुण्ठ का अधिकारी बना। गोकर्ण के पिता आत्मदेव श्रीमद्भागवत् महापुराण  के दशम स्कन्‍ध का प्रतिदिन पाठ करके मुक्त हो गये।
व्यासजी महाभारत जैसे ग्रन्‍थ तथा अन्य पुराणों की रचना करके भी जब अपने मन में शान्‍ति का अनुभव नहीं कर रहे थे तो नारदजी उन्हें श्रीमद्भागवत् महापुराण का प्रणयन करने के लिये कहा और ऐसा करके श्रीव्यासजी ने परम शान्‍ति का अनुभव किया।
श्रीमद्भागवत् महापुराण यदि पाण्‍डित्य परीक्षा का साधन है तो दूसरी तरफ जीवात्मा एवं उसके प्राप्य परमात्मा के स्वरूप एवं सम्बन्‍धों का स्पष्टतम निरूपण है। यदि यह पुराण पारमहंस्य संहिता होने के कारण निवृत्त धर्म का समर्थन करता है तो दूसरी तरफ यह एक सामान्य मनुष्य को भी मोक्ष पद तक प्राप्त करने के सरलतम साधनों का निर्देश करता है। अजामिल जैसा पापी पुरुष भी अन्‍तिम समय में भगवन्नाम का उच्चारण करके अपना आत्म कल्याण कर लेता है।
यह एक ऐसा पुराण है जो भगवान् और भक्त दोनों की समुचित रूप से चर्चा करता है।
यद्यपि श्रीमद्भागवत् की दृष्‍टि से भगवान् श्री कृष्‍ण ही शुभाश्रय हो सकते हैं। किसी भी श्रेणी का जीव शुभाश्रय नहीं हो सकता है किन्तु परमात्मा की आराधना की पूर्ति में भगवद् भक्तों  की आराधना का बड़ा ही महत्त्व है। क्योंकि भगवद् भक्त ही जिज्ञासु अथवा अधिकारी को परमात्माराधना के मार्ग पर प्रवृत्त करने में सहायक होते हैं। ये भगवद् भक्त ऐसे महापुरुष हैं जो अपनी आराधना के बल पर श्रीकृष्‍ण की कृपा के पात्र बन चुके हैं। ऐसे महापुरुषों का संयोग तो तब ही संभव हो पाता है जबकि अधिकारी का बहुत अधिक पुण्य उपार्जित हो जाय अथवा उस पर भगवान् श्रीकृष्‍ण की कृपा हो जाय। यह सत्संगति परमात्म कृपैकलभ्य है ऐसा श्रीरामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी लिखा है-
सत्संगति महिमा नहीं गोई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
श्रीमद्भागवत् महापुराण में स्‍थान-स्‍थान पर सत्संगति की महिमा बतलायी गयी है। बालक नारद जी को परमात्म-स्वरूप का ज्ञान सन्त या महापुरुषों की सत्संगति से ही होता है। श्रीव्याजीमहाराज को भी  मनःसन्तोष श्रीनारदजी के ही सत्संगति से हुई है। धुवजी के परमात्माराधन का मार्ग आचार्य नारद ही प्रशस्त करते हैं। अतएव आचार्य की प्राप्‍ति अथवा सत्संति की प्राप्‍ति तो बड़े सौभाग्य से होती है।
सत्संग‌ की ऐसी महिमा है कि उसके द्वारा आत्मकल्याण कामी पुरुष सांसारिक भोगों से विषण्‍ण हो जाता है तथा उसका मन परमात्मा में लग जाता है। इसके पश्चात् जीव सदाचार्य का वरण करके परमात्मा को ही एक मात्र रक्षक के रूप में अपना लेता है।
इस तरह स्पष्ट है कि श्रीमद्भागवत् ग्रन्‍थ मोक्ष चाहने वाले आत्मकल्याण कामियों को चाहिये कि वे इसको अपने कल्याण के लिए अवश्य अपनाएँ तथा श्रीमद्भागवत् जी में बतलाए गये अर्थें का चिन्तन एवं मनन करें।
कृष्‍णप्राप्‍तिकरं शश्वत् प्रेमानन्दफलप्रदम्। श्रीमद्भागवतं शास्‍त्रं कलौ कीरेणभाषितम्।।


।। जयश्रीकृष्‍ण ।।

Tuesday, January 10, 2012

कान्हा दर्शन ज्योतिष केन्द्र

ज्योतिष भगवान् नारायण का नेत्र है। ऐक नेत्र सूर्य दूसरा सूर्य अौर इन्हीं दोनों ग्रहों के सहयोग से ही ज्योतिष विषय की गणित प्रारम्‍भ होती है। अतः जितने सत्य सूर्य और चन्द्र हैं उतनी ही सत्य ज्योतिष विद्या है ये अलग बात है कि ज्योतिष ‌विद्या का फलित सिद्घान्त श्रापित है।
आचार्य धीरेन्द्र 
मो. 09871662417

शयन, उपवेशन, नेत्रपाणि प्रकाशन, गमन, आगमन, सभा वास, आगम, भोजन, नृत्य लिप्सा, कौतुक, निद्रा-अवस्था-कथन

  शयन , उपवेशन , नेत्रपाणि प्रकाशन , गमन , आगमन , सभा वास , आगम , भोजन , नृत्य लिप्सा , कौतुक , निद्रा-अवस्था-कथन   शयनं चोपवेशं च नेत्र...