Monday, February 16, 2015

Trees

पेड़ बचाओ, जीवन पाओ

* पेड़ बचेंगे तो बने रहेंगे हम...।

* वृक्ष धरा का आभूषण है करता दूर प्रदूषण है।

* बिना बात क्यों हार्न बजाएं ध्वनि प्रदूषण क्यों फैलाएं।

* अगर चाहिए लंबी आयु सेवन करें स्वच्छ जलवायु।

* वृक्षारोपण कार्य महान एक वृक्ष सौ पुत्र समान।

* पर्यावरण को स्वच्छ बनाएं रोगों को दूर भगाएं।

* हमारा शरीर पंच तत्व से बना है। इसमें जल, वायु, अग्नि पृथ्वी और आकाश शामिल हैं।

* पर्यावरण का स्वच्छ एवं सन्तुलित होना मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।

Saturday, February 14, 2015

कैंसर

कैंसर रोग का परिचय

नेता हो या अभिनेता, खिलाड़ी हो या आम जनता, रोग किसी को नहीं जानता। वह तो केवल रोगी की काया को जानता है और अपना कार्य करता रहता है जिसमें उसे कभी हार तो कभी जीत मिलती है। लेकिन रोग के कारण हार तो केवल इन्सान की ही होती है। हम बात करते हैं ऐसे असाध्य और गंभीर रोग कैंसर की जिसका नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हंै।
कैंसर रोग से पीड़ित व्यक्ति अपने जीवन जीने की उम्र का शीघ्र अंत मान कर जीते जी ही मरने का दुःस्वप्न देखने लगता है जिसके चलते रोगी की मानसिक, !ाारीरिक तथार् आिर्थक स्तर में निरन्तर गिरावट आना प्रांरभ हो जाता है। यदि कैंसर रोग का पता शुरू में नहीं चल पाता है तो कैंसर रोग शरीर में एक विषवृक्ष की तरह शीघ्र फैलता जाता है। तिष में कैंसर जैसे भयानक रोग की उत्पत्ति में कौन-कौन से ग्रहां का प्रभाव रहता है इसे जाना जा सकता है। ज्योतिष सृष्टि संचरण की घड़ी है एवं व्यक्ति की जन्म कुण्डली सोनोग्राफी है जिसके विष्लेषण से कैंसर रोग होने की संभावना का पता लगाया जा सकता है। यदि समय रहते प्रतिकूल ग्रहों को मंत्रों एवं अन्य उपाय से ठीक किया जाय तो कैंसर जैसे भयंकर रोग से काफी हद तक बचा जा सकता है।

स्वास्थ्य

सही मार्गदर्शन

💥१. घर में सुबह सुबह कुछ देर के लिए भजन अवशय लगाएं ।
💥२. घर में कभी भी झाड़ू को खड़ा करके नहीं रखें, उसे पैर नहीं लगाएं, न ही उसके ऊपर से गुजरे अन्यथा घर में बरकत की कमी हो जाती है। झाड़ू हमेशा छुपा कर रखें |
💥३. बिस्तर पर बैठ कर कभी खाना न खाएं, ऐसा करने से बुरे सपने आते हैं।
💥४. घर में जूते-चप्पल इधर-उधर बिखेर कर या उल्टे सीधे करके नहीं रखने चाहिए इससे घर में अशांति उत्पन्न होती है।
💥५. पूजा सुबह 6 से 8बजे के बीच भूमि पर आसन बिछा कर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके बैठ कर करनी चाहिए । पूजा का आसन जुट अथवा कुश का हो तो उत्तम होता है |
💥६. पहली रोटी गाय के लिए निकालें । इससे देवता भी खुश होते हैं और पितरों को भी शांति मिलती है |
💥७.पूजा घर में सदैव जल का एक कलश भरकर रखें जो जितना संभव हो ईशान कोण के हिस्से में हो |
💥८. आरती, दीप, पूजा अग्नि जैसे पवित्रता के प्रतीक साधनों को मुंह से फूंक मारकर नहीं बुझाएं।
💥९. मंदिर में धूप, अगरबत्ती व हवन कुंड की सामग्री दक्षिण पूर्व में रखें अर्थात आग्नेय कोण में |
💥१०. घर के मुख्य द्वार पर दायीं तरफ स्वास्तिक बनाएं।
💥११. घर में कभी भी जाले न लगने दें, वरना भाग्य और कर्म पर जाले लगने लगते हैं और बाधा आती है |
💥१२. सप्ताह में एकबार जरुर समुद्री नमक अथवा सेंधा नमक से घर में पोछा लगाएं | इससे नकारात्मक ऊर्जा हटती है |
💥१३. कोशिश करें की सुबह के प्रकाश की किरने आपके पूजा घर में जरुर पहुचे सबसे पहले |
💥१४. पूजा घर में अगर कोई प्रतिष्ठित मूर्ती है तो उसकी पूजा हर रोज निश्चित रूप से हो ऐसी व्यवस्था कर.

"पानी पिने का सही वक़्त".
(1) 3 गिलास सुबह उठने के बाद,
.....अंदरूनी उर्जा को एक्टिवेट
करता है...
(2) 1 गिलास नहाने के बाद,
......ब्लड प्रेशर का खात्मा करता है।
(3) 2 गिलास खाने से 30 मिनट पहले,
........हाजमे को दुरुस्त रखता है।
(4) आधा गिलास सोने से पहले,
......हार्ट अटैक से बचाता है।

कान्हादर्शन ज्योतिष केंद्र
आचार्य धीरेन्द्र

Wednesday, September 18, 2013

नवरात्रि

नवरात्रि 

नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है नौ रातें । यह पर्व साल में चार बार आता है।चैत्र,आषाढ,अश्विन,पोषप्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातो में तीन देवियों - महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वतीया सरस्वतीकि तथा दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं ।
नौ देवियाँ है :-


  1. श्री शैलपुत्री
  2. श्री ब्रह्मचारिणी
  3. श्री चंद्रघंटा
  4. श्री कुष्मांडा
  5. श्री स्कंदमाता
  6. श्री कात्यायनी
  7. श्री कालरात्रि
  8. श्री महागौरी
  9. श्री सिद्धिदात्री

शक्ति की उपासना का पर्व शारदेय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की । तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं । नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।
नवदुर्गा और दस महाविधाओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविधाएँ अनंत सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।

चौमासे में जो कार्य स्थगित किए गए होते हैं, उनके आरंभ के लिए साधन इसी दिन से जुटाए जाते हैं। क्षत्रियों का यह बहुत बड़ा पर्व है। इस दिन ब्राह्मण सरस्वती-पूजन तथा क्षत्रिय शस्त्र-पूजन आरंभ करते हैं। विजयादशमी या दशहरा एक राष्ट्रीय पर्व है। अर्थात आश्विन शुक्ल दशमी को सायंकाल तारा उदय होने के समय 'विजयकाल' रहता है। यह सभी कार्यों को सिद्ध करता है। 

आश्विन शुक्ल दशमी पूर्वविद्धा निषिद्ध, परविद्धा शुद्ध और श्रवण नक्षत्रयुक्त सूर्योदयव्यापिनी सर्वश्रेष्ठ होती है। अपराह्न काल, श्रवण नक्षत्र तथा दशमी का प्रारंभ विजय यात्रा का मुहूर्त माना गया है। दुर्गा-विसर्जन, अपराजिता पूजन, विजय-प्रयाग, शमी पूजन तथा नवरात्र-पारण इस पर्व के महान कर्म हैं। इस दिन संध्या के समय नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है। क्षत्रिय/राजपूतों इस दिन प्रातः स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर संकल्प मंत्र लेते हैं। इसके पश्चात देवताओं, गुरुजन, अस्त्र-शस्त्र, अश्व आदि के यथाविधि पूजन की परंपरा है।

प्रमुख कथा

लंका-युद्ध में ब्रह्माजी ने श्रीराम से रावण वध के लिए चंडी देवी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने को कहा और बताए अनुसार चंडी पूजन और हवन हेतु दुर्लभ एक सौ आठ नीलकमल की व्यवस्था की गई। वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरता के लोभ में विजय कामना से चंडी पाठ प्रारंभ किया। यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम से श्रीराम के पास पहुँचाई और परामर्श दिया कि चंडी पाठ यथासभंव पूर्ण होने दिया जाए। इधर हवन सामग्री में पूजा स्थल से एक नीलकमल रावण की मायावी शक्ति से गायब हो गया और राम का संकल्प टूटता-सा नजर आने लगा। भय इस बात का था कि देवी माँ रुष्ट न हो जाएँ। दुर्लभ नीलकमल की व्यवस्था तत्काल असंभव थी, तब भगवान राम को सहज ही स्मरण हुआ कि मुझे लोग 'कमलनयन नवकंच लोचन' कहते हैं, तो क्यों न संकल्प पूर्ति हेतु एक नेत्र अर्पित कर दिया जाए और प्रभु राम जैसे ही तूणीर से एक बाण निकालकर अपना नेत्र निकालने के लिए तैयार हुए, तब देवी ने प्रकट हो, हाथ पकड़कर कहा- राम मैं प्रसन्न हूँ और विजयश्री का आशीर्वाद दिया। वहीं रावण के चंडी पाठ में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की सेवा में ब्राह्मण बालक का रूप धर कर हनुमानजी सेवा में जुट गए। 

           निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मणों ने हनुमानजी से वर माँगने को कहा। इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा- प्रभु, आप प्रसन्न हैं तो जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं, उसका एक अक्षर मेरे कहने से बदल दीजिए। ब्राह्मण इस रहस्य को समझ नहीं सके और तथास्तु कह दिया। मंत्र में भूर्तिहारिणी में 'ह' के स्थान पर 'क' उच्चारित करें, यही मेरी इच्छा है। भूर्तिहरिणी यानी कि प्राणियों की पीड़ा हरने वाली और 'करिणी' का अर्थ हो गया प्राणियों को पीड़ित करने वाली, जिससे देवी रुष्ट हो गईं और रावण का सर्वनाश करवा दिया। हनुमानजी महाराज ने श्लोक में 'ह' की जगह 'क' करवाकर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी।

नवरात्रि Navratri

नवरात्रि 

नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है नौ रातें । यह पर्व साल में चार बार आता है।चैत्र,आषाढ,अश्विन,पोषप्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातो में तीन देवियों - महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वतीया सरस्वतीकि तथा दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं ।
नौ देवियाँ है :-


  1. श्री शैलपुत्री
  2. श्री ब्रह्मचारिणी
  3. श्री चंद्रघंटा
  4. श्री कुष्मांडा
  5. श्री स्कंदमाता
  6. श्री कात्यायनी
  7. श्री कालरात्रि
  8. श्री महागौरी
  9. श्री सिद्धिदात्री

शक्ति की उपासना का पर्व शारदेय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की । तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं । नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।
नवदुर्गा और दस महाविधाओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविधाएँ अनंत सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।

चौमासे में जो कार्य स्थगित किए गए होते हैं, उनके आरंभ के लिए साधन इसी दिन से जुटाए जाते हैं। क्षत्रियों का यह बहुत बड़ा पर्व है। इस दिन ब्राह्मण सरस्वती-पूजन तथा क्षत्रिय शस्त्र-पूजन आरंभ करते हैं। विजयादशमी या दशहरा एक राष्ट्रीय पर्व है। अर्थात आश्विन शुक्ल दशमी को सायंकाल तारा उदय होने के समय 'विजयकाल' रहता है। यह सभी कार्यों को सिद्ध करता है। 

आश्विन शुक्ल दशमी पूर्वविद्धा निषिद्ध, परविद्धा शुद्ध और श्रवण नक्षत्रयुक्त सूर्योदयव्यापिनी सर्वश्रेष्ठ होती है। अपराह्न काल, श्रवण नक्षत्र तथा दशमी का प्रारंभ विजय यात्रा का मुहूर्त माना गया है। दुर्गा-विसर्जन, अपराजिता पूजन, विजय-प्रयाग, शमी पूजन तथा नवरात्र-पारण इस पर्व के महान कर्म हैं। इस दिन संध्या के समय नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है। क्षत्रिय/राजपूतों इस दिन प्रातः स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर संकल्प मंत्र लेते हैं। इसके पश्चात देवताओं, गुरुजन, अस्त्र-शस्त्र, अश्व आदि के यथाविधि पूजन की परंपरा है।

प्रमुख कथा

लंका-युद्ध में ब्रह्माजी ने श्रीराम से रावण वध के लिए चंडी देवी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने को कहा और बताए अनुसार चंडी पूजन और हवन हेतु दुर्लभ एक सौ आठ नीलकमल की व्यवस्था की गई। वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरता के लोभ में विजय कामना से चंडी पाठ प्रारंभ किया। यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम से श्रीराम के पास पहुँचाई और परामर्श दिया कि चंडी पाठ यथासभंव पूर्ण होने दिया जाए। इधर हवन सामग्री में पूजा स्थल से एक नीलकमल रावण की मायावी शक्ति से गायब हो गया और राम का संकल्प टूटता-सा नजर आने लगा। भय इस बात का था कि देवी माँ रुष्ट न हो जाएँ। दुर्लभ नीलकमल की व्यवस्था तत्काल असंभव थी, तब भगवान राम को सहज ही स्मरण हुआ कि मुझे लोग 'कमलनयन नवकंच लोचन' कहते हैं, तो क्यों न संकल्प पूर्ति हेतु एक नेत्र अर्पित कर दिया जाए और प्रभु राम जैसे ही तूणीर से एक बाण निकालकर अपना नेत्र निकालने के लिए तैयार हुए, तब देवी ने प्रकट हो, हाथ पकड़कर कहा- राम मैं प्रसन्न हूँ और विजयश्री का आशीर्वाद दिया। वहीं रावण के चंडी पाठ में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की सेवा में ब्राह्मण बालक का रूप धर कर हनुमानजी सेवा में जुट गए। 

           निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मणों ने हनुमानजी से वर माँगने को कहा। इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा- प्रभु, आप प्रसन्न हैं तो जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं, उसका एक अक्षर मेरे कहने से बदल दीजिए। ब्राह्मण इस रहस्य को समझ नहीं सके और तथास्तु कह दिया। मंत्र में भूर्तिहारिणी में 'ह' के स्थान पर 'क' उच्चारित करें, यही मेरी इच्छा है। भूर्तिहरिणी यानी कि प्राणियों की पीड़ा हरने वाली और 'करिणी' का अर्थ हो गया प्राणियों को पीड़ित करने वाली, जिससे देवी रुष्ट हो गईं और रावण का सर्वनाश करवा दिया। हनुमानजी महाराज ने श्लोक में 'ह' की जगह 'क' करवाकर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी।

तुलसी Tulsi



तुलसी


तुलसी - एक  शाकीय, औषधीय पौधा है। यह झाड़ी के रूप में उगता है और १ से ३ फुट ऊँचा होता है। इसकी पत्तियाँ बैंगनी आभा वाली हल्के रोएँ सो ढकी होती है। पत्तियाँ १ से २ इंच लम्बी सुगंधित और अंडाकार या आयताकार होती हैं। पुष्प मंजरी अति कोमल एवं ८ इंच लम्बी और बहुरंगी छटाओं वाली होती है, जिस पर बैंगनी और गुलाबी आभा वाले बहुत छोटे हृदयाकार पुष्प चक्रों में लगते हैं। बीज चपटे पीतवर्ण के छोटे काले चिह्नों से युक्त अंडाकार होते हैं। नए पौधे मुख्य रूप से वर्षा ऋतु में उगते है और शीतकाल में फूलते हैं। पौधा सामान्य रूप से दो-तीन वर्षों तक हरा बना रहता है। इसके बाद इसकी वृद्धावस्था आ जाती है। पत्ते कम और छोटे हो जाते हैं और शाखाएँ सूखी दिखाई देती हैं। इस समय उसे हटाकर नया पौधा लगाने की आवश्यकता प्रतीत होती है।

Wednesday, November 21, 2012

श्रीराम चालीसा

।। श्रीराम चालीसा ।।

।। श्री मैथिली रमणो विजयते ।।
दोहाः-
जय रघुनन्दन रसिक वर जीवन प्राण अधार।
कृपा दृष्टि अवलोकिये रसिया रस दातार।।
चैपाई
जय रसिकेश रसिक मन हारी। जानकि बल्लभ अवधबिहारी।।
जय-जय जीवन प्राण पियारे। कृपा सनेह सदन सुकुमारे।।
जय-जय रास रसिक वन नागर। जय जानकी रमण रस सागर।।
जय अवधेश जनेश दुलारे। रूप अनूप जगत उजियारे।।
जय सरयू तट कुंज विहारी। कोटि मदन छबि पर बलिहारी।।
जय-जय कोशलेश सुत प्यारे। रसिकन मन चित चोरन हारे।।
जय मैथिली दृगन  के  तारे। रसमय  पावन  चरित तिहारे।।
जय रसिकन रस प्रेम प्रदायक। जय रस रूप सकल रसनायक।।
जय-जय शरणागत भयहारी। श्रीप्रमोद बन कुंज बिहारी।।
जयति अनादि अशेष कृपाला। जानकि जीवन रूप रसाला।।
छबि गुन शील रूप सुख सागर। अमित तेज बल बुद्धि उजागर।।
जयति कृपा करुणा सुख कन्दा। हरण सकल कलिमल भ्रमफन्दा।।
जय-जय जगत जनक जग कारण। करुणानिधि भूभार उतारण।।
शिवविधि विष्णुदेव मुनिनारद। शुक सनकादिक ब्रह्मविशारद।।
नाथचरण सरोज चित धरहीं। हित सों ध्यावत उर सुख भरहीं।।
जनमन रुचिको सदा निबाहत। निज ऐश्वर्य स्वरूप भुलावत।।
निज भक्तन पर सर्वस वारत। सेवक हित मानव तन धारत।।
प्राकृत जनइव करि नरलीला। संतन सुखद मोद रसलीला।।
हे सिय रंग रंगे पिय प्यारे। जीवन धन मम दृगन सितारे।।
एकबार हँसि हृदय लगाइय। संसय मोह समूल नसाइय।।
लेत  जो विबसहुँ नाम तुम्हारा। सोउ बिन श्रम उतरत भव पारा।।
प्रेम समेत जपै मनलाई। तेहिं कर विनहीं मोल बिकाई।।
वाकी योग क्षेम निज हाथा। करत न देर लगावत नाथा।।
आत्म समर्पण जो करि देवै।  केवल नाथ शरण गति लेवै।।
निज सर्वस तेहिं ऊपरवारी। पीछे चलत धनुष करधारी।।
हौं अधमाधम अति अघरूपा। अधम उधारन रघुकुलभूपा।।
डूब रहेउँ भवसिन्धु मझारी। निजकर गहि अब लेहुँ उबारी।।
शरणागत प्राणहुँ ते प्यारो। तब दृढ़ ब्रत श्रुति शास्त्रा पुकारो।।
सुनि अस बिरद शरण तब आयो। बिनु गथ प्रभु के हाथ बिकायो।।
अब अपनाइअ निज जनजानी। सुहृद सुशील कृपा गुनखानी।।
अति अज्ञान  हृदय  ममछायो। अहमिति  बस  निजरूप भुलायो।।
जगत अनित्य सत्य सम जानी। रमत सदा यामें सुख मानी।।
अति चंचल मन विषयनमाहीं। पगो रहत कबहूँ थिर नाहीं।।
राग   दोष  ईर्षा   कुटिलाई। छल प्रपंच अतिसय दुखदाई।।
बिबिध भाँति नित मोहिं नचावें। नाथ चरण ते दूर बहावें।।
जेहि पर तब कर कंजन छाया। डरति सदा तेहि ते जड़माया।।
याते पुनि-पुनि कहौं निहोरी। अति सभीत मैं दोउ करजोरी।।
चरण शरण में अब रख लीजै। हिय में आप बसेरो कीजै।।
स्वयं प्रकाश होइ उरमाहीं। मिटै अविद्या संसय नाहीं।।
सीता शरण नाथ की आशा। सकल जगत से रहौं निराशा।।
दोहाः-
युगल चरण पंकजन में मधुकर इव मन मोर।
सीताशरण बसै सदा विनय अहै चित चोर।।
सावधान एकान्त में मन करि परम सचेत।
पाठ करै अति शुचि हृदय सादर प्रेम समेत।।
सो रघुनन्दन की कृपा पावै अविचल धाम।
सीताशरण सदा हृदय विहरैं सीताराम।।
छं. सो.-
जय रसिकेश उदार प्राण जीवन धन प्यारे।
जय छबि निधि सुख सिन्धु रूप गुनशील उजारे।।
जय जय करुणा खानि मृदुलचित कृपा अगारा।
निज जन मन अभिराम जयति रघुबंश कुमारा।।
निर्हेतुकी दयालु प्रणत जन आँनन्द कारी।
भक्त बछल सुख धाम राम श्रीअवध बिहारी।।
निज पद कँज दिखाय हरिय अति बिपति हमारी।
सीता शरण बिलोक चरण होइहौं बलिहारी।।
।। श्री राम चालीसा सम्पूर्ण ।।
।। जय श्रीराम।।
कान्हादर्शन ज्योतिष केन्द्र
आचार्य धीरेन्द्र
mo.9871662417

Saturday, November 10, 2012

बैकुण्ठ चतुर्दशी



।। बैकुण्ठ चतुर्दशी ।।

कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी कहते हैं, इसमें यमराज का पूजन होता है। और कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को बैकुण्ठ चतुर्दशी कहते हैं। बैकुण्ठ चतुर्दशी को प्रणवेश विष्णु, केदारेश शंकर भगवान की पूजा करनी चाहिये। इस दिन कमल फष्प से पूजन किया जाय तो सर्वश्रेष्ठ है।
प्रातः स्नान आदि से निवृत्त हो दिन भर व्रत रखें, तथा रात्रि में भगवान विष्णु की पूजा करें। फिर शंकर जी की पूजा करें। दूसरे दिन स्नान आदि से निवृत्त हो शिवजी का पूजन करके ब्राह्मणों को जिमाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करना चाहिये। ऐसा करने से भगवान विष्णु भक्ति एवं भगवान शिव सुख संपत्ति देते हैं।  लोक परलोक दोनों सुधरता है।
कथा-एक समय भगवान विष्णु ने कार्तिक शुक्ला चतुर्दशी को ब्रह्म मुहूर्त में मणिकार्णिका यह घाट काशी विश्वनाथ में स्थित है-घाट में स्नान कर पार्वती का पूजन करके शिव जी का पूजन किया। तथा एक हजार कमल पुष्पों से अर्चन का संकल्प कर पुष्प चढ़ाने लगे। परीक्षार्थ एक पुष्प शिव लीला से कम हो गया। भगवान ने सोचा मेरे भक्त मुझे कमलनयन कहते हैं। झट से नेत्र चढ़ाने के लिये निकालने को उद्यत हुए, भोलेनाथ ने प्रगट होकर हाथ पकड़ लिया और वरदान मांगने को कहा। विष्णु भगवान ने कहा-प्रभु, राक्षसों से रक्षार्थ आयुध सूर्य की प्रभा वाला सुदर्शन चक्र प्रदान किया। और कहा जो मेरी भक्ति करता है, और विष्णु से द्वेष करता है। ‘‘ अर्थात् शिवभक्त विष्णु भगवान् का विरोधी नहीं होना चाहिये और विष्णु भक्त शिव द्रोही नहीं होना चाहिये’ यदि ऐसा कोई भक्त है तो वह घोर नरकों में वास करता है। भगवान् शिवजी कहते हैं कि मुझे विष्णु अतिशय प्रिय है। बैकुण्ठ से आकर चतुर्दशी को पूजन किया है, इसलिये इसका नाम बैकुण्ठ चतुर्दशी होगा।
इस दिन जो पहले भगवान् नारायण का पूजन कर भगवान् भूत-भावन चन्द्र मौलीश्वर भोलेनाथ का पूजन करता है, उसे बैकुण्ठ धाम प्राप्त होता है इसमें कोई संशय नहीं है।

शयन, उपवेशन, नेत्रपाणि प्रकाशन, गमन, आगमन, सभा वास, आगम, भोजन, नृत्य लिप्सा, कौतुक, निद्रा-अवस्था-कथन

  शयन , उपवेशन , नेत्रपाणि प्रकाशन , गमन , आगमन , सभा वास , आगम , भोजन , नृत्य लिप्सा , कौतुक , निद्रा-अवस्था-कथन   शयनं चोपवेशं च नेत्र...