Friday, 27 July 2012

रक्षाबंधन


रक्षाबंधन  02 अगस्त 2012 गुरुवार को मनाया जायेगा

(भाई बहनों का त्योहार)

        एक समय युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा—प्रभो अब तक मैंने बहुत कथायें सुनी। प्रभो अब ऐसी कथा सुनाइये जिससे सब रोग दोष शान्त होकर एक वर्ष सुखपूर्वक व्यतीत हो सके।

       भगवान ने कहा—एक समय इन्द्र राक्षसों से युद्ध कर हताश हो गये जीत नहीं मिली इन्द्र ने देव गुरु बृहस्पति की शरण ली। और कहा—गुरुदेव अब क्या करूँ? अब तो युद्ध करना ही श्रेयस्कर है।

       गुरु ने कहा समय देखकर चलना चाहिये। इन्द्राणी ने कहा मैं कुछ व्यवस्था करती हूँ। इन्द्राणी ने ऋषियों से रक्षा विधान करवाकर इन्द्र के हाथ में डोरा बांध दिया। राक्षसों ने डोरा बंधा हुआ देखा, वे राक्षस डरे और भाग खड़े हुए।
भगवान ने कहा उपाकर्म के पश्चात् चौकी लगाकर कलश स्थापन कर रेशमी वस्त्र में अक्षत, सरसों, स्वर्ण खण्ड की पोटली बनाकर कलश पर रखकर रक्षा की अधिष्ठात्री देवी का पूजन कर हाथ में पोटली बांधे।

रक्षाबन्धन (श्रावण शुक्ला पूर्णिमा)

        श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को भद्रा रहित समय में रक्षाबंधन का त्योहार मनाना चाहिये। रक्षाबंधन के पहले दिन दरवाजे के दोनों तरफ गोबर के जल से धोकर 6 × 6 इंच के आकार का उस पर सूण (पुरुष आकार) या स्वास्तिक (सातिया) गेरु से लिख देना चाहिये। पूर्णिमा को मूंग, भात या मिठाई से जिमाना चाहिए।
पहले रोली चावल से पूजा करें बाद में जिमाना चाहिये। किसी-किसी मत से भद्रा आदि में भी रक्षाबंधन उत्सव मनाते हैं। लेकिन शास्त्रें में भद्रा में दो कार्य करने के लिये मना करते हैं।

       श्लोक—‘‘भद्रा द्वे न कर्तव्यो श्रावणी फाल्गुनी तथा।’’ भद्राकाल में दो कयार्यों को नहीं करना चाहिये, पहला—रक्षाबन्धन और दूसरा होलिकादहन।
प्रायः करके भोजन के उपरान्त राखी बांधने की परम्परा सामने आती है, जिसे सभी को स्वीकार करना चाहिये।

बहिन भाई के हाथ में राखी बांधते हैं। बहिन दुर्गा का स्वरूप है, बहिन देवताओं से प्रार्थना करती है, मेरे भाई की सब प्रकार से रक्षा करो। भाई.बहन को रुपया देता है। परन्तु भाई का कर्तव्य है, बहिन की हर तरह से रक्षा करे।

वामन भगवान जब बलि के यहां पहरा देने लगे, लक्ष्मी माता बहुत परेशान हुई। नारद द्वारा पता चला भगवान बलि के यहां है। बलि गंगा स्नान करने के लिये आया माता लक्ष्मी भी वहां वेश बदलकर घाट के किनारे बैठ गईं और रोने लगी। बलि की नजर पड़ी पूछा देवी क्यों रो रही हो, कौन हो आप, लक्ष्मी जी ने कहा क्या करूं मेरे कोई भाई नहीं है, बलि ने कहा तुम्हारे कोई भाई नहीं है, मेरे कोई बहिन नहीं है, चलो आज से मैं तुम्हारा भाई तुम मेरी बहिन हुई।

घर ले जाकर बलि ने राखी बंधवाई, और कहाµबहिन क्या सेवा करूं। लक्ष्मी जी ने कहा भाई इस दरबान वामन के बिना मेरा बैकुण्ठ सूना है, इसे दे दो। कहते.कहते लक्ष्मी जी के आंखों में आंसू छलक पड़े। सुनते ही मूर्छित हो गया। जब होश में आये तो भाई को दुःखी देखकर कहा-भैया दुःखी न हो, दरबान नहीं चाहिये। बलि ने कहा मेरी बहिन पति बिना दुखी हो। भाई कैसे सहन कर सकता है, वामन जी ने कृपा की, एक रूप से बैकुण्ठ गये, एक रूप में दरबान बने रहे।

पंडित जन इसी मंत्र से रक्षा सूत्र (कलावा, मौली) बांधते हैं-
मन्त्र—
        येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
       तेन त्वामनु बध्नामि रक्षेमाचल मा चल।।

।। इति श्रावणी, कर्म-रक्षाबंधन, भाई-बहनों का त्यौहार ।।

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