Friday, March 11, 2016

कण्ठमाला (Tonsillitis)

कण्ठमाला (Tonsillitis)
परिचय:-

कण्ठमाला रोग से पीड़ित रोगी की गर्दन में गांठें हो जाती हैं जिसके कारण उसके शरीर में मल का विष अधिक बढ़ जाता है जिसकी सफाई होना बहुत बहुत आवश्यक है।
कण्ठमाला का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी को 2 दिन के लिए उपवास रखना चाहिए और उपवास के समय में केवल फलों का रस पीना चाहिए तथा एनिमा क्रिया करके पेट को साफ करना चाहिए। इसके बाद रोगी को प्रतिदिन उदरस्नान तथा मेहनस्नान करना चाहिए।
कण्ठों के पास की गांठों पर भापस्नान देकर दिन में 3 बार मिट्टी की पट्टी बांधनी चाहिए और रात के समय में इन गांठों पर हरे रंग की बोतल का सूर्यतप्त तेल लगाना चाहिए।
यदि रोगी की गर्दन पर गांठ बननी शुरू हुई है तो तुलसी और अरण्डी की पत्ती बराबर मात्रा में लेकर और पीसकर फिर उनमें थोड़ा-सा नमक मिलाकर गर्म-गर्म ही गांठ पर बांध देने से रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है और रोगी का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को आसमानी रंग की बोतल का सूर्यतप्त जल 2 भाग तथा लाल रंग की बोतल का सूर्यतप्त जल 1 भाग मिलाकर लगभग 25 मिलीलीटर की मात्रा में दिन में 2 बार सेवन करने से तथा गांठों पर लगभग 10 मिनट तक नीला प्रकाश डालने और सप्ताह में 1-2 बार एप्सम साल्टबाथ (गर्म पानी में हल्का नमक डालकर, उस पानी से स्नान करना) भी करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। इस उपचार को करने के साथ-साथ व्यक्ति को शरीर और सांस की हल्की कसरत भी करनी चाहिए।

Monday, March 7, 2016

Maha shivratri pooja vidhi

।। महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ ।।
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महाशिवरात्रि पूजन : शिवपुराण विधि विधान
(शिवरात्रि पूजन शिवपुराण के अनुसार करें(
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शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता में बताया गया है कि शिवरात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा पार्वती के पूछने पर भगवान सदाशिव ने बताया कि शिवरात्रि व्रत करने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है। मोक्ष की प्राप्ति कराने वाले चार संकल्प पर नियमपूर्वक पालन करना चाहिए।
ये चार संकल्प हैं-
शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा, रुद्रमंत्र का जप, शिवमंदिर में उपवास तथा काशी में देहत्याग। शिवपुराण में मोक्ष के चार सनातन मार्ग बताए गए हैं। इन चारों में भी शिवरात्रि व्रत का विशेष महत्व है। अतः इसे अवश्य करना चाहिए।
यह सभी के लिए धर्म का उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकामभाव से सभी मनुष्यों, वर्णों, स्त्रियों, बालकों तथा देवताओं के लिए यह महान व्रत परम हितकारक माना गया है। प्रत्येक मास के शिवरात्रि व्रत में भी फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी में होने वाले महाशिवरात्रि व्रत का शिवपुराण में विशेष महात्म्य है।
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उपवास में रात्रि जागरण क्यों? :-

ऋषि मुनियों ने समस्त आध्यात्मिक अनुष्ठानों में उपवास को महत्वपूर्ण माना है। 'विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देनिहः' के अनुसार उपवास विषय निवृत्ति का अचूक साधन है। अतः आध्यात्मिक साधना के लिए उपवास करना परमावश्यक है। उपवास के साथ रात्रि जागरण के महत्व पर संतों का यह कथन अत्यंत प्रसिद्ध है-'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।'
इसका सीधा तात्पर्य यही है कि उपासना से इन्द्रियों और मन पर नियंत्रण करने वाला संयमी व्यक्ति ही रात्रि में जागकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हो सकता है। अतः शिवोपासना के लिए उपवास एवं रात्रि जागरण उपयुक्त हो सकता है? रात्रि प्रिय शिव से भेंट करने का समय रात्रि के अलावा और कौन समय हो सकता है?
इन्हीं सब कारणों से इस महान व्रत में व्रतीजन उपवास के साथ रात्रि में जागकर शिव पूजा करते हैं। इसलिए महाशिवरात्रि को रात के चारों पहरों में विशेष पूजा की जाती है। सुबह आरती के बाद यह उपासना पूर्ण होती है।
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महाशिवरात्रि पूजा विधि : -
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शिवपुराण के अनुसार व्रती पुरुष को प्रातः काल उठकर स्नान संध्या कर्म से निवृत्त होने पर मस्तक पर भस्म का तिलक और गले में रुद्राक्षमाला धारण कर शिवालय में जाकर शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन एवं शिव को नमस्कार करना चाहिए। तत्पश्चात उसे श्रद्धापूर्वक व्रत का इस प्रकार संकल्प करना चाहिए-
शिवरात्रिव्रतं ह्येतत्‌ करिष्येऽहं महाफलम।
निर्विघ्नमस्तु से चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते
।
यह कहकर हाथ में लिए पुष्पाक्षत्‌ जल आदि को छोड़ने के पश्चात यह श्लोक पढ़ना चाहिए-
देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु से
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव।
तव प्रसादाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाशः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि
॥
हे देवदेव! हे महादेव! हे नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है। हे देव! मैं आपका शिवरात्रि व्रत करना चाहता हूं। हे देवश्वर! आपकी कृपा से यह व्रत निर्विघ्न पूर्ण् हो और काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रु मुझे पीड़ित न करें।
रात्रि पूजा का विधान :-
दिनभर अधिकारानुसार शिवमंत्र का यथाशक्ति जप करना चाहिए अर्थात्‌ जो द्विज हैं और जिनका विधिवत यज्ञापवीत संस्कार हुआ है तथा नियमपूर्वक यज्ञोपवीत धारण करते हैं। उन्हें ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करना चाहिए परंतु जो द्विजेतर अनुपनीत एवं स्त्रियां हैं, उन्हें प्रणवरहित केवल शिवाय नमः मंत्र का ही जप करना चाहिए।
रुग्ण, अशक्त और वृद्धजन दिन में फलाहार ग्रहण कर रात्रि पूजा कर सकते हैं, वैसे यथाशक्ति बिना फलाहार ग्रहण किए रात्रिपूजा करना उत्तम है।
रात्रि के चारों प्रहरों की पूजा का विधान शास्त्रकारों ने किया है। सायंकाल स्नान करके किसी शिवमंदिर जाकर अथवा घर पर ही सुविधानुसार पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर और तिलक एवं रुद्राक्ष धारण करके पूजा का इस प्रकार संकल्प करे-देशकाल का संकीर्तन करने के अनंतर बोले- 'ममाखिलपापक्षयपूर्वकसकलाभीष्टसिद्धये शिवप्रीत्यर्थ च शिवपूजनमहं करिष्ये।' अच्छा तो यह है कि किसी वैदिक विद्वान ब्राह्मण के निर्देश में वैदिक मंत्रों से रुद्राभिषेक का अनुष्ठान करवाएं।

🙏 श्री त्रिपुरसुन्दरी वेदगुरुकुलम् 🙏
आचार्य धीरेन्द्र

Tuesday, February 16, 2016

Vedant (वेदांत)

वेदांत 
वेदांत शब्द 'वेद' और 'अंत' इन दो शब्दों के मेल से बना है, अत: इसका वाक्यार्थ वेद अथवा वेदों का अंतिम भाग है। वैदिक साहित्य मुख्यत: तीन भागों में विभक्त है-
कर्मकाण्ड
ज्ञानकाण्ड
उपासनाकाण्ड
साधारणत: वैदिक साहित्य के ब्राह्मण भाग को, जिसका सम्बन्ध यज्ञों से है, उसे कर्मकाण्ड कहते हैं
उपनिषदें ज्ञानकाण्ड कहलाती हैं जिसमें उपासना भी सम्मिलित है।
उपासनाकाण्ड का अर्थ क्रमश: 'तात्पर्य', 'सिद्धांत' तथा 'आंतरिक अभिप्राय' अथवा मंतव्य भी किया गया है।
देवी-देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी, सारा विश्वप्रपच, नाम-रूपात्मक जगत ब्रह्म से भिन्न नहीं; यही वेदांत अर्थात वेदसिद्धांत है। जो कुछ दृष्टिगोचर होता है, जो कुछ नाम-रूप से सम्बोधित होता है, उसकी सत्ता ब्रह्म की सत्ता से भिन्न नहीं।
मनुष्य का एक मात्र कर्त्तव्य ब्रह्मज्ञान प्राप्ति, ब्रह्ममयता, ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति है। यही एक बात वेदों का मौलिक सिद्धांत, अंतिम तात्पर्य तथा सर्वोच्च-सर्वमान्य अभिप्राय है। यही वेदांत शब्द का मूलार्थ है। इस अर्थ में वेदांत शब्द से उपनिषद ग्रंथों का साक्षात्‌ बोध होता है। परवर्ती काल में वेदांत का तात्पर्य वह दार्शनिक सम्प्रदाय भी हो गया जो उपनिषदों के आधार पर केवल ब्रह्म की ही एक मात्र सत्ता मानता है। कई सूक्ष्म भेदों के आधार पर इसके कई उपसम्प्रदाय भी हैं, जैसे अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैतवाद आदि।
भर्तुमित्र, जयन्त कृत 'न्यायमंजरी' तथा यामुनाचार्य के 'सिद्धित्रय' वेदांत आचार्य रहे थे।
Acharya Dhirendra
Shri Tripursundari ved Gurkulam

Saturday, February 6, 2016

नरक चतुर्दशी

नरक निवारण चतुर्दशी कल है ।💐मौनी आमावस्या💐
08-02-2016 इस आमवस्या का विशेष महत्त्व माना गया हैं। इसको "दर्श अमावस्या" "योग अमावस्या" भी कहा गया हैं। कल के दिन आपके पूजा-पाठ, व्रत-उपवास करने से आप अपने कुंडली के अशुभ ग्रहों को शुभ बना सकते हैं।

हमारे शास्त्रों में "मौन" को बहुत बड़ा व्रत माना जाता हैं। तपश्चर्या करने वाले और मौन रहकर आध्यात्म और धर्म की सेवा साधना करने वाले संतों को हमारे सामाजिक जीवन में  "मुनि" कहा जाता हैं। मौन सबसे बड़ी साधना है और मौन व्रती की आतंरिक शक्तियां इतनी अधिक विकसित हो  जाती हैं कि वह साधक को संसार की समस्त वस्तुएँ सहज ही उपलब्ध करवा देती हैं। गौतम बुद्ध जैसे साधक भी अपनी मौन साधना की वजह से जगत्प्रसिद्ध हो गए हैं। 🍀
वास्तव में अमावस्या तिथि को हम पितरों के निमित्त अपनी जो भी श्रद्धा और समर्पण का भाव और सम्मान अर्पित करते है उनसे हमारे पितृ देव सब प्रसन्न होकर हमें आशीर्वाद देते है और उनके इस उपकार से हम उनका आशीर्वाद पाकर अपने ग्रह दोषों को अनुकूल बना सकते हैं। इसी पितृ पूजा को हम हमेशा से अमावस्या को करते आये हैं। कल की अमावस्या का भी इसी क्रम में विशेष महत्त्व बन गया हैं। कल के दिन का व्रत करने से पूजा आदि करने से हम अपने कुंडली के अशुभ ग्रह के साथ साथ अपने जीवन में हो रही आर्थिक परेशानियों, लड़ाई झगड़ा, कर्ज आदि से भी मुक्ति पा सकते है।🍀
💢 अब आइये जानते है की क्या कैसे पूजा करनी है और किसकी करनी है ?
मृत्यु पश्चात् मुक्ति के देवता महादेव श्री शंकर जी ही हमारे पितरों से आशीर्वाद दिलाने वाले देवता हैं। कल एक तो चतुर्दशी, और ऊपर से रविवार का दिन और नरक निवारण चतुर्दशी साथ साथ माघ का पावन महीना और मौनी अमावस्या इन सबका एक अद्भुत संयोग बना है जो आपके थोड़े से पूजा पाठ प्रयास से आपको  बहुत अधिक सफलता दिला सकता हैं।🍀
🌹कल सुबह और परसो भी स्नान ध्यान पश्चात् आप थोड़ी देर या कुछ घंटे या जितना संभव है उतना देर मौन व्रत  रखिये और स्नान के समय ही अपने पितृ देवों के उद्धार के लिए व्रत का संकल्प लेना हैं। अपनी श्रद्धा भक्ति के अनुसार आप भगवान शिव जी की पूजा अर्चना करिये। अपने गुरु प्रदत्त मन्त्र या अपने इष्ट का मंत्र जाप पूजा करिये  और उनसे अपने कष्टों के निवारण की प्रार्थना करिये। कल पीपल को काला तिल डालकर जल देकर अपने पितरों से एवं श्री नारायण और माता महालक्षमी से अपने ओवर कृपा की प्रार्थना करिये।
किसी धर्मानुचारी ब्राह्मण को अपने  यहाँ बुलाकर श्रद्धा पूर्वक भोजन आदि करवाकर दान दीजिये। गाय को और किसी निर्धन को भोजन करवा कर आप अपने समस्त जाने अनजाने पापों का नाश कर सकते हैं। कल के और परसो के दिन आप किसी पुण्य स्थल, धर्म स्थल, पवित्र नदी पर स्नान दान जाप पूजा किसी भी प्रकार का पुण्य आपके समस्त पापों का नाश करके आपके जीवन को सफल बना सकता हैं। 🍀🙏 निवेदन करना है की सोमवार के दिन कम से कम क्रोध करिये और जादा से जादा मौन रहिये। मौन से हमारे शरीर में ऊर्जा का विशेष संग्रह होता है और सकारात्मक ऊर्जा हमारे जीवन में हमें सफकता दिलाती हैं। यहाँ आप स्वयं देखिये की दूसरा भाव वाणी का कारक भाव और धन कुटुंब का कारक भाव भी वही होता है। जब आप मौन रहेंगे तब कुटुंब के साथ साथ आपका धन भी बढ़ता चला जायेगा। 💢🌹🍀
💢🌹सावधानी : आसुरी प्रवृत्तियों की बलशाली अवस्था के चलते पूरी दुनिया में अमावस्या के दिन निर्माण कार्य मकान हो या कल कारखाने आदि के नहीं होते हैं। कल के दिन वाहन चलाने और किसी भी खतरनाक से लगने वाले  कामों में सावधानी जरुरी हैं।🍀
💢💢🙏 जय श्रीहरि 🙏💢
[सोमवार को होने से यह सोमवती आमावस्या भी कहा गया है
कहते हैं भगवान शिव संसार के कष्ट मिटाने इस दिन आते हैं ।
🌷जय शम्भो🌷
शुभमस्तु
Shri Tripursundari ved gurukulam
💐💐🙏🙏💐💐

Monday, February 16, 2015

Trees

पेड़ बचाओ, जीवन पाओ

* पेड़ बचेंगे तो बने रहेंगे हम...।

* वृक्ष धरा का आभूषण है करता दूर प्रदूषण है।

* बिना बात क्यों हार्न बजाएं ध्वनि प्रदूषण क्यों फैलाएं।

* अगर चाहिए लंबी आयु सेवन करें स्वच्छ जलवायु।

* वृक्षारोपण कार्य महान एक वृक्ष सौ पुत्र समान।

* पर्यावरण को स्वच्छ बनाएं रोगों को दूर भगाएं।

* हमारा शरीर पंच तत्व से बना है। इसमें जल, वायु, अग्नि पृथ्वी और आकाश शामिल हैं।

* पर्यावरण का स्वच्छ एवं सन्तुलित होना मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।

Saturday, February 14, 2015

कैंसर

कैंसर रोग का परिचय

नेता हो या अभिनेता, खिलाड़ी हो या आम जनता, रोग किसी को नहीं जानता। वह तो केवल रोगी की काया को जानता है और अपना कार्य करता रहता है जिसमें उसे कभी हार तो कभी जीत मिलती है। लेकिन रोग के कारण हार तो केवल इन्सान की ही होती है। हम बात करते हैं ऐसे असाध्य और गंभीर रोग कैंसर की जिसका नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हंै।
कैंसर रोग से पीड़ित व्यक्ति अपने जीवन जीने की उम्र का शीघ्र अंत मान कर जीते जी ही मरने का दुःस्वप्न देखने लगता है जिसके चलते रोगी की मानसिक, !ाारीरिक तथार् आिर्थक स्तर में निरन्तर गिरावट आना प्रांरभ हो जाता है। यदि कैंसर रोग का पता शुरू में नहीं चल पाता है तो कैंसर रोग शरीर में एक विषवृक्ष की तरह शीघ्र फैलता जाता है। तिष में कैंसर जैसे भयानक रोग की उत्पत्ति में कौन-कौन से ग्रहां का प्रभाव रहता है इसे जाना जा सकता है। ज्योतिष सृष्टि संचरण की घड़ी है एवं व्यक्ति की जन्म कुण्डली सोनोग्राफी है जिसके विष्लेषण से कैंसर रोग होने की संभावना का पता लगाया जा सकता है। यदि समय रहते प्रतिकूल ग्रहों को मंत्रों एवं अन्य उपाय से ठीक किया जाय तो कैंसर जैसे भयंकर रोग से काफी हद तक बचा जा सकता है।

स्वास्थ्य

सही मार्गदर्शन

💥१. घर में सुबह सुबह कुछ देर के लिए भजन अवशय लगाएं ।
💥२. घर में कभी भी झाड़ू को खड़ा करके नहीं रखें, उसे पैर नहीं लगाएं, न ही उसके ऊपर से गुजरे अन्यथा घर में बरकत की कमी हो जाती है। झाड़ू हमेशा छुपा कर रखें |
💥३. बिस्तर पर बैठ कर कभी खाना न खाएं, ऐसा करने से बुरे सपने आते हैं।
💥४. घर में जूते-चप्पल इधर-उधर बिखेर कर या उल्टे सीधे करके नहीं रखने चाहिए इससे घर में अशांति उत्पन्न होती है।
💥५. पूजा सुबह 6 से 8बजे के बीच भूमि पर आसन बिछा कर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके बैठ कर करनी चाहिए । पूजा का आसन जुट अथवा कुश का हो तो उत्तम होता है |
💥६. पहली रोटी गाय के लिए निकालें । इससे देवता भी खुश होते हैं और पितरों को भी शांति मिलती है |
💥७.पूजा घर में सदैव जल का एक कलश भरकर रखें जो जितना संभव हो ईशान कोण के हिस्से में हो |
💥८. आरती, दीप, पूजा अग्नि जैसे पवित्रता के प्रतीक साधनों को मुंह से फूंक मारकर नहीं बुझाएं।
💥९. मंदिर में धूप, अगरबत्ती व हवन कुंड की सामग्री दक्षिण पूर्व में रखें अर्थात आग्नेय कोण में |
💥१०. घर के मुख्य द्वार पर दायीं तरफ स्वास्तिक बनाएं।
💥११. घर में कभी भी जाले न लगने दें, वरना भाग्य और कर्म पर जाले लगने लगते हैं और बाधा आती है |
💥१२. सप्ताह में एकबार जरुर समुद्री नमक अथवा सेंधा नमक से घर में पोछा लगाएं | इससे नकारात्मक ऊर्जा हटती है |
💥१३. कोशिश करें की सुबह के प्रकाश की किरने आपके पूजा घर में जरुर पहुचे सबसे पहले |
💥१४. पूजा घर में अगर कोई प्रतिष्ठित मूर्ती है तो उसकी पूजा हर रोज निश्चित रूप से हो ऐसी व्यवस्था कर.

"पानी पिने का सही वक़्त".
(1) 3 गिलास सुबह उठने के बाद,
.....अंदरूनी उर्जा को एक्टिवेट
करता है...
(2) 1 गिलास नहाने के बाद,
......ब्लड प्रेशर का खात्मा करता है।
(3) 2 गिलास खाने से 30 मिनट पहले,
........हाजमे को दुरुस्त रखता है।
(4) आधा गिलास सोने से पहले,
......हार्ट अटैक से बचाता है।

कान्हादर्शन ज्योतिष केंद्र
आचार्य धीरेन्द्र

Wednesday, September 18, 2013

नवरात्रि

नवरात्रि 

नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है नौ रातें । यह पर्व साल में चार बार आता है।चैत्र,आषाढ,अश्विन,पोषप्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातो में तीन देवियों - महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वतीया सरस्वतीकि तथा दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं ।
नौ देवियाँ है :-


  1. श्री शैलपुत्री
  2. श्री ब्रह्मचारिणी
  3. श्री चंद्रघंटा
  4. श्री कुष्मांडा
  5. श्री स्कंदमाता
  6. श्री कात्यायनी
  7. श्री कालरात्रि
  8. श्री महागौरी
  9. श्री सिद्धिदात्री

शक्ति की उपासना का पर्व शारदेय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की । तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं । नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।
नवदुर्गा और दस महाविधाओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविधाएँ अनंत सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।

चौमासे में जो कार्य स्थगित किए गए होते हैं, उनके आरंभ के लिए साधन इसी दिन से जुटाए जाते हैं। क्षत्रियों का यह बहुत बड़ा पर्व है। इस दिन ब्राह्मण सरस्वती-पूजन तथा क्षत्रिय शस्त्र-पूजन आरंभ करते हैं। विजयादशमी या दशहरा एक राष्ट्रीय पर्व है। अर्थात आश्विन शुक्ल दशमी को सायंकाल तारा उदय होने के समय 'विजयकाल' रहता है। यह सभी कार्यों को सिद्ध करता है। 

आश्विन शुक्ल दशमी पूर्वविद्धा निषिद्ध, परविद्धा शुद्ध और श्रवण नक्षत्रयुक्त सूर्योदयव्यापिनी सर्वश्रेष्ठ होती है। अपराह्न काल, श्रवण नक्षत्र तथा दशमी का प्रारंभ विजय यात्रा का मुहूर्त माना गया है। दुर्गा-विसर्जन, अपराजिता पूजन, विजय-प्रयाग, शमी पूजन तथा नवरात्र-पारण इस पर्व के महान कर्म हैं। इस दिन संध्या के समय नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है। क्षत्रिय/राजपूतों इस दिन प्रातः स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर संकल्प मंत्र लेते हैं। इसके पश्चात देवताओं, गुरुजन, अस्त्र-शस्त्र, अश्व आदि के यथाविधि पूजन की परंपरा है।

प्रमुख कथा

लंका-युद्ध में ब्रह्माजी ने श्रीराम से रावण वध के लिए चंडी देवी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने को कहा और बताए अनुसार चंडी पूजन और हवन हेतु दुर्लभ एक सौ आठ नीलकमल की व्यवस्था की गई। वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरता के लोभ में विजय कामना से चंडी पाठ प्रारंभ किया। यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम से श्रीराम के पास पहुँचाई और परामर्श दिया कि चंडी पाठ यथासभंव पूर्ण होने दिया जाए। इधर हवन सामग्री में पूजा स्थल से एक नीलकमल रावण की मायावी शक्ति से गायब हो गया और राम का संकल्प टूटता-सा नजर आने लगा। भय इस बात का था कि देवी माँ रुष्ट न हो जाएँ। दुर्लभ नीलकमल की व्यवस्था तत्काल असंभव थी, तब भगवान राम को सहज ही स्मरण हुआ कि मुझे लोग 'कमलनयन नवकंच लोचन' कहते हैं, तो क्यों न संकल्प पूर्ति हेतु एक नेत्र अर्पित कर दिया जाए और प्रभु राम जैसे ही तूणीर से एक बाण निकालकर अपना नेत्र निकालने के लिए तैयार हुए, तब देवी ने प्रकट हो, हाथ पकड़कर कहा- राम मैं प्रसन्न हूँ और विजयश्री का आशीर्वाद दिया। वहीं रावण के चंडी पाठ में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की सेवा में ब्राह्मण बालक का रूप धर कर हनुमानजी सेवा में जुट गए। 

           निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मणों ने हनुमानजी से वर माँगने को कहा। इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा- प्रभु, आप प्रसन्न हैं तो जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं, उसका एक अक्षर मेरे कहने से बदल दीजिए। ब्राह्मण इस रहस्य को समझ नहीं सके और तथास्तु कह दिया। मंत्र में भूर्तिहारिणी में 'ह' के स्थान पर 'क' उच्चारित करें, यही मेरी इच्छा है। भूर्तिहरिणी यानी कि प्राणियों की पीड़ा हरने वाली और 'करिणी' का अर्थ हो गया प्राणियों को पीड़ित करने वाली, जिससे देवी रुष्ट हो गईं और रावण का सर्वनाश करवा दिया। हनुमानजी महाराज ने श्लोक में 'ह' की जगह 'क' करवाकर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी।

नवरात्रि Navratri

नवरात्रि 

नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है नौ रातें । यह पर्व साल में चार बार आता है।चैत्र,आषाढ,अश्विन,पोषप्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातो में तीन देवियों - महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वतीया सरस्वतीकि तथा दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं ।
नौ देवियाँ है :-


  1. श्री शैलपुत्री
  2. श्री ब्रह्मचारिणी
  3. श्री चंद्रघंटा
  4. श्री कुष्मांडा
  5. श्री स्कंदमाता
  6. श्री कात्यायनी
  7. श्री कालरात्रि
  8. श्री महागौरी
  9. श्री सिद्धिदात्री

शक्ति की उपासना का पर्व शारदेय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की । तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं । नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।
नवदुर्गा और दस महाविधाओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविधाएँ अनंत सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।

चौमासे में जो कार्य स्थगित किए गए होते हैं, उनके आरंभ के लिए साधन इसी दिन से जुटाए जाते हैं। क्षत्रियों का यह बहुत बड़ा पर्व है। इस दिन ब्राह्मण सरस्वती-पूजन तथा क्षत्रिय शस्त्र-पूजन आरंभ करते हैं। विजयादशमी या दशहरा एक राष्ट्रीय पर्व है। अर्थात आश्विन शुक्ल दशमी को सायंकाल तारा उदय होने के समय 'विजयकाल' रहता है। यह सभी कार्यों को सिद्ध करता है। 

आश्विन शुक्ल दशमी पूर्वविद्धा निषिद्ध, परविद्धा शुद्ध और श्रवण नक्षत्रयुक्त सूर्योदयव्यापिनी सर्वश्रेष्ठ होती है। अपराह्न काल, श्रवण नक्षत्र तथा दशमी का प्रारंभ विजय यात्रा का मुहूर्त माना गया है। दुर्गा-विसर्जन, अपराजिता पूजन, विजय-प्रयाग, शमी पूजन तथा नवरात्र-पारण इस पर्व के महान कर्म हैं। इस दिन संध्या के समय नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है। क्षत्रिय/राजपूतों इस दिन प्रातः स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर संकल्प मंत्र लेते हैं। इसके पश्चात देवताओं, गुरुजन, अस्त्र-शस्त्र, अश्व आदि के यथाविधि पूजन की परंपरा है।

प्रमुख कथा

लंका-युद्ध में ब्रह्माजी ने श्रीराम से रावण वध के लिए चंडी देवी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने को कहा और बताए अनुसार चंडी पूजन और हवन हेतु दुर्लभ एक सौ आठ नीलकमल की व्यवस्था की गई। वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरता के लोभ में विजय कामना से चंडी पाठ प्रारंभ किया। यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम से श्रीराम के पास पहुँचाई और परामर्श दिया कि चंडी पाठ यथासभंव पूर्ण होने दिया जाए। इधर हवन सामग्री में पूजा स्थल से एक नीलकमल रावण की मायावी शक्ति से गायब हो गया और राम का संकल्प टूटता-सा नजर आने लगा। भय इस बात का था कि देवी माँ रुष्ट न हो जाएँ। दुर्लभ नीलकमल की व्यवस्था तत्काल असंभव थी, तब भगवान राम को सहज ही स्मरण हुआ कि मुझे लोग 'कमलनयन नवकंच लोचन' कहते हैं, तो क्यों न संकल्प पूर्ति हेतु एक नेत्र अर्पित कर दिया जाए और प्रभु राम जैसे ही तूणीर से एक बाण निकालकर अपना नेत्र निकालने के लिए तैयार हुए, तब देवी ने प्रकट हो, हाथ पकड़कर कहा- राम मैं प्रसन्न हूँ और विजयश्री का आशीर्वाद दिया। वहीं रावण के चंडी पाठ में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की सेवा में ब्राह्मण बालक का रूप धर कर हनुमानजी सेवा में जुट गए। 

           निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मणों ने हनुमानजी से वर माँगने को कहा। इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा- प्रभु, आप प्रसन्न हैं तो जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं, उसका एक अक्षर मेरे कहने से बदल दीजिए। ब्राह्मण इस रहस्य को समझ नहीं सके और तथास्तु कह दिया। मंत्र में भूर्तिहारिणी में 'ह' के स्थान पर 'क' उच्चारित करें, यही मेरी इच्छा है। भूर्तिहरिणी यानी कि प्राणियों की पीड़ा हरने वाली और 'करिणी' का अर्थ हो गया प्राणियों को पीड़ित करने वाली, जिससे देवी रुष्ट हो गईं और रावण का सर्वनाश करवा दिया। हनुमानजी महाराज ने श्लोक में 'ह' की जगह 'क' करवाकर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी।

शयन, उपवेशन, नेत्रपाणि प्रकाशन, गमन, आगमन, सभा वास, आगम, भोजन, नृत्य लिप्सा, कौतुक, निद्रा-अवस्था-कथन

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