Saturday, 10 November 2012

धन्वन्तरी जयन्ती Dhanvantari Jayanti

धन्वन्तरी जयन्ती

यह जयन्ती कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को सायंकाल में मनाई जाती है। संत दुर्वाशा मुनि के श्राप से देवता श्री, लक्ष्मी हीन हो गये। सब देवताओं ने ब्रह्माजी को आगे कर भगवान विष्णु की शरण गही। भगवान् के पूछे जाने पर देवताओं ने कहा प्रभु-हम सब आपकी कृपा का आश्रय चाहते हैं। प्रभु ने कहा-निकम्मे को कभी कुछ प्राप्त नहीं हो सकता। उद्योग एवं उत्साह ही मेरा स्वरूप है। क्यों बैठे हो-जाओ दैत्यों से संधि करके मन्दराचल पर्वत से समुद्र को मथ डालो उससे अमृत निकलेगा। पीकर सब फिर सबल हो जाओगे। देवताओं ने कहा-प्रभु-समुद्र मंथनें पर अमृत तो मक्खन की तरह फैल जायेगा। भगवान् ने कहा-चिन्ता मत करो, अमृत कलश लेकर मैं स्वयं धन्वन्तरी रूप से निकलूंगा। मेरे नाम मात्र से रोग नष्ट होंगे। स्मरण मात्रार्तिनाशनः मोहिनी रूप धर कर सब तुमको पिला दूंगा। इस कलश का बड़ा महत्व होगा। इसके पूजन के बिना सिद्धि नहीं होगी। इसकी पूजा करने से सब मनोरथ सफल होंगे।


      देवदानवसंवादे मथ्यमानेमहोदधौ।

      उत्पन्नोसि तदा कुम्भ विधृतोविष्णुना स्वयम्।।

      त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं कर्तुमीहे जलोद्भव।

      सान्निध्यं कुरुमे देव प्रसन्नो भव सर्वदा।।

तेरी प्रसन्न्ता के लिये पूजन कर राहा हूं। आप प्रसन्न होइये। सायंकाल में धंवन्तरी जी का पूजन करना चाहिये। एवं उत्सव मनाना चाहिये।

 || OM ||

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