Friday, 27 July 2012

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा


श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत

—भारत के समस्त धार्मिक स्थलों में 10 अगस्त, शुक्रवार को रात्रि 12 : 00 बजे श्रीकृष्ण जन्म मनाया जायेगा

—9 अगस्त गुरुवार को स्मार्तानाम्  श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत पर्व मनाया जायेगा।

द्वापर युग में जब पृथ्वी पापाचार.अत्याचार से दुखी हुई माता पृथ्वी ने गौ का रूप धारण कर ब्रह्मा जी की शरण में गई तब सब देवों को साथ ले ब्रह्मा जी ने क्षीर सागर में जाकर भगवान नारायण की पुरुष सूक्त के द्वारा सुन्दर स्तुति की। प्रभु ने आदेश दिया— मैं वसुदेव के यहां देवकी के गर्भ से अवतार लूंगा। आप लोग भी व्रज में अवतार लो और मेरी लीला में सहयोगी बनना।

उग्रसेन के छोटे भाई देवक की पुत्री जब विवाह के योग्य हुई तो वसुदेव जी के साथ देवकी का विवाह किया। उग्रसेन का बली पुत्र कंस संसार में प्रेम दिखाने के लिये सारथी को हटाकर स्वयं रथ की बागडोर संभालकर चलाने लगा। प्रभु ने सोचा जिस मां के गर्भ से मेरा प्रागट्य होने वाला है, उसकी बागडोर कंस के हाथ में हो यह उचित नहीं, सभी जन समुदाय कंस की वाह.वाह कर रहे थे। कंस के हृदय में क्या है? 

यह प्रगट करने के लिये आकाश से आवाज आई। अस्यास्त्वाष्टमों गर्भो हन्तायांवहसे बुध। इसके आठवें गर्भ के द्वारा तेरी मृत्यु होगी। सुनते ही कंस रथ से नीचे कूद पड़ा। तलवार निकाल देवकी का सिर काटना चाहा। वसुदेव जी ने रोका और कहा (श्लाघनीयः गुणः सूरै भवान्, भोज यशस्करः)। आप जैसे प्रसंशनीय वीर को एक अबला की हत्या कर देना शोभा नहीं देता। आप को देवकी से नहीं अपितु उसके गर्भ से डर है सो मैं वचन देता हूं कि इसके जो बालक होंगे जन्म लेते ही तुम्हें समर्पित कर दूंगा। तब आपकी जो इच्छा हो सो करना। वसुदेव की बात का विश्वास करके कंस ने देवकी को छोड़ दिया। 

भगवान ने शेष से एवं धर्म पत्नी से कहा अब अवतार का समय आ गया है, वासुदेव ने छः पुत्रें को कंस के हाथों में सौंप चुके हैं, और वे मारे भी जा चुके हैं। भगवान ने महामाया को आदेश दिया, देवकी के गर्भ को नन्द जी के यहां व्रज में रोहिणी के गर्भ में स्थापित करो। तथा तुम यशोदा के गर्भ से जन्म ग्रहण करो। और मैं भी आ रहा हूं। देवकी और वसुदेव कारागार में बन्द थे। प्रभु ने सोचा गोलोक धाम (बैकुण्ठ धाम) का सुख तो बहुत देखा। अब इच्छा हे, इन कारागार वासियों के दुःख दर्द को आनन्द में परिवर्तित करूं। उनको भी कृतकृत्य करना चाहिये। इसीलिये कंस के कारागार में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी दिन बुधवार और रोहणी नक्षत्र में ठीक रात्रि के बारह (12) बजे भगवान कन्हैया का प्रादुर्भाव हुआ।

बोलिये बालकृष्ण लाल की जय। कृष्ण  कन्हैया   लाल   की  जय।।

      वसुदेव जी को भगवान ने आदेश दिया मुझे गोकुल नन्द बाबा के यहां पहुंचाओ तथा यशोदा के यहां कन्या ने जन्म ग्रहण किया है, उस कन्या को तुम ले आओ। वसुदेव जी सूप में लेकर चले। तो सब ताले खुल गये, सब सैनिक सो गये, यमुना ने मार्ग दे दिया। पानी की हल्की.हल्की बूंदे पड़ रही थीं। यहां गोकुल में भी सब सोये हुए थे। वसुदेव जी ने यशोदा के पास कृष्ण को सुलाकर कन्या को लेकर आ गये। संसार में वास्तविक चमत्कार दिखाई दिया। प्रभु के आते ही सब बन्धन ताले खुल गये और महामाया के आते ही बन्धन ताले पुनः लग गये। कन्या कारागार में पहुंचते ही तेजी से रोई। सब जाग गये। कंस को पता चला कंस ने आकर देवकी के हाथों से कन्या को छीन पत्थर पर दे मारा। कन्या उसके हाथ से छूटकर सिर पर लात मारकर आकाश में अष्टभुजी देवी के रूप में परिणित हुई और कहा—

        कंस मेरे को मारने से क्या लाभ। तेरे शत्रु का तो प्रादुर्भाव हो चुका है।
        इस प्रकार से दूसरे दिन गोकुल में भगवान का दिव्य जन्मोत्सव मनाया गया व्रज में भगवान श्री कृष्ण नित्य ही नयी लीला करते हुए 11 वर्ष 56 दिन के होते होते कंस का उद्धार किया। 

      कंस के मारने के पश्चात माता-पिता को प्रणाम करने गये। प्रेम विह्वल माता-पिता आनन्दातिरेक में मग्न थे प्रजा जय-जयकार कर रही थी। सबने प्रार्थना की प्रभो आपका जन्मोत्सव न मना सके। अब आप वरदान दें। आपके जन्मोत्सव का फल एवं आनन्द प्राप्त हो सके। श्री कृष्ण ने वरदान दिया—और कहा जन्म दिन के समय मेरी व्रज लीलाओं के चित्र दीवारों पर लिखने या लगाने चाहिये। एक सूतिका गृह बनाना चाहिये। जिसमें मां देवकी बालक कृष्ण हो तथा अन्य सब हो। सब का पूजन करना चाहिये।

।। पूजन ।।

          भगवत्यै श्री देवक्यै नमः, श्री वसुदेवाय नमः, श्री बलभद्राय नमः, श्री यशोदायै नमः श्री नन्दाय नमः। श्री नन्दात्मजायै महामायायै नमः। श्री कृष्णाय नमः। श्री कृष्णाय सपरिवाराय नमः। आवाहयामि पूजयामि।

   इस प्रकार पूजन आदि कर बधाई गीत आदि गाना चाहिये। उपरान्त कृष्ण लीला चिन्तन तथा आरती करें, प्रसाद आदि ग्रहण करें।

।। इति ।।

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